गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

दुनिया अब रात-रात लगती है..

जो उन्हें क़ायनात लगती है,
मुझको तो वाहियात लगती है।
आपको चांद इश्क लगता है
हमको उसकी बिसात लगती है।
हमसे इक ज़िंदगी भी जी न गई,
आपको दाल-भात लगती है।


हम भी आंखों में ख़ुदा रखते थे,
अब तो बीती-सी बात लगती है।

एक ही रात लुट गया सब कुछ,,
दुनिया अब रात-रात लगती है।
उनके नारों में इनकलाब नहीं,
जलसे वाली जमात लगती है।

आप कहते हैं डेमोक्रेसी है,
हमको चमचों की जात लगती है।

निखिल आनंद गिरि

3 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

वाह ! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...!

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rashmi savita ने कहा…

1 of urs best.

Akhilendra ने कहा…

kya baat hai..!!