गुरुवार, 15 अगस्त 2013

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है..

‘’1947 में भारत का बंटवारा इसलिए नहीं हुआ कि भारत की नियति के बारे में हिंदुओं और मुसलमानों के पास अलग-अलग ठंडे तर्क थे और वैज्ञानिक दृष्टियां थीं। वह इसलिए हुआ कि दोनों कौमों के जुनून अलग होते गये, आधी रात के सपने अलग होते गये, और उनके मिथक-विश्व वक्र और विपरीत बनते गये। अंधेरे में घट रहे इस रहस्यमय रसायन को निश्चय ही दिन भर की घटनाओं ने मदद पहुंचायी। दिन की घटना यह थी कि सिंहासन पर भारतवायों के बैठने का दिन नज़दीक आ रहा था। और रात का आतंक यह था कि इस सिंहासन पर कौन बैठेगा और कैसे बैठेगा ?’’

(राजेंद्र माथुर के लेख ‘’गहरी नींद के सपनों में बनता हुआ देश) का हिस्सा)

14 अगस्त को देश की राजधानी दिल्ली में कई जगहों पर झंडे फहराए गए। कई जगह तुड़े-मुड़े, मैले-कुचैले झंडे थे तो कई जगह राष्ट्रगान की जगह कोई और फिल्मी या देशभक्ति गाना बजाकर औपचारिकता पूरी कर ली गयी। एक ‘फंक्शन’ में तो मैं भी था जहां जो लोग झंडा फहरा रहे थे, क पीछे झुग्गी में रह रहे कुछ लोग अपना कामधाम छोड़कर ये सब ऐसे देख रहे थे जैसे उनके इलाके में बड़े दिन बाद मनोरंजन के लिए कोई तमाशा हो रहा हो। फेसबुक पर इसको लेकर स्टेटस डाला तो कई लोगों ने बताया कि ऐसा कई स्कूलों में होता रहा है कि 15 अगस्त की ‘छुट्टी’ की वजह से 14 तारीख को ही आज़ादी मना ली जाती है। मुझे 14 अगस्त को झंडा फहरा लिए जाने से कोई आपत्ति नहीं है। रोज़ ही फहराइए, मगर उस आज़ादी का मतलब ही क्या, जिसमें हम 15 अगस्त की सुबह देश की राजधानी में सुरक्षा के नाम पर खुलेआम घूम ही नहीं सकें, पूरी पुलिस और ट्रैफिक एक लालकिले का सालों साल पुराना और बोरिंग सरकारी फंक्शन कराने में खर्च हो जाए। अगर स्कूल-कॉलेजों में 14 अगस्त को ही झंडा फहराकर काम ‘निपटा’ लिया जाना है तो 15 अगस्त को सरकारी और 14 अगस्त को आम लोगों की आजादी का दिन घोषित कर दिया जाना चाहिए। अगर सुरक्षा सचमुच इतनी बड़ी समस्या है तो रात के बारह बजे ही क्यों नहीं समारोह मना लिए जाएं। आखिर आज़ादी का असली जश्न भी तो हमने रात ही में मनाया था।

उन झंडों को उतार फेंकना चाहिए जिन्हें कोई तानाशाह अपनी नापाक नज़र से घूरता है, सलाम करता है, हमें झूठी उम्मीदें देता है, चुनाव करीब आने पर हमारी सड़कें पक्की करवाता है, हमारी नालियां बनवा देता है और फिर हमें नाली का कीड़ा समझने लगता है। हम उसे खुशी-खुशी सत्ता का नज़राना सौंपते हैं। क्या आजादी सिर्फ वीआईपी लोगों की सरकारी फाइलों में झंडे के साथ फोटो खिंचवाने के लिेए कर्फ्यू लगा देने का दिन है। कोई देश अगर आगे न बढ़े तो थोडे दिन ठहरकर, चुप रहकर इंतज़ार किया जा सकता है । मगर कोई देश लगातार पीछे जाता दिखे, विकल्पहीनता की स्थिति में जाता दिखे तो फिर गुस्से में गालियां बकने की आज़ादी तो मिलनी ही चाहिए। विकल्पहीनता ऐसी कि देश शब्द कहते ही आप सांप्रदायिक समझे जाने लगें। हद है कि हम मजबूर हैं कि हमें एक उल्लू और भेड़िए में से ही किसी को जंगल का राजा चुन लेना है। विकल्पहीनता ऐसी कि प्राइवेट, सनसनीख़ेज़, तीसमारखां, सबसे तेज होते हुए भी तमाम अख़बारों और चैनलों को सब कुछ रोककर एक घिसे-पिटे भाषण का सीधा प्रसारण करना ही पड़ता है। राज्यों की असली तस्वीर के बजाय झांकियां ऐसी कि जैसे धो-पोंछ कर घर के बक्से से कोई पुरानी तस्वीर देख रहे हों। हद है। तेलंगाना, कश्मीर, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, गुजरात को छूट दीजिए हुक्मरानों और फिर देखिए कैसी-कैसी झांकियां आपकी खिदमत में पेश होती हैं। दिल्ली को ही छूट देकर देख लीजिए।

आइए आजादी के मौके पर शर्म करें कि हम एक ऐसे मुल्क में रहते हैं जहां सबसे बड़ी आबादी युवाओं की है और फिर भी हम मान चुके हैं कि हमारी तरक्की प्रॉपर्टी डीलर्स के हाथ में है, घटिया हुक्मरानों के हाथ में है और अब इसका कुछ नहीं हो सकता। आइए 52 सेकेंड के राष्ट्रगान के बजाय दो मिनट का मौन रखें कि हमारे आगे जो कुछ ग़लत होता है, हम वहां सिर्फ मौन रह जाते हैं, भीतर-भीतर मरते जाते हैं। शर्म करें कि जो कुछ हमारे सामने होता है, उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हम ही ज़िम्मेदार हैं। आइए शर्म करें कि हम वैसे हिंदू हैं जो देशभक्ति के नाम पर दिन-रात पाकिस्तान को गालियां देते हैं और देश के कोने-कोने में हमारी नफरत झेलता एक ‘मिनी-पाकिस्तान’ बसता है। आइए शर्म करें कि जिस तिरंगे को हम अपना झंडा कहते हैं उसके तीन रंगों के नाम हम अपनी मातृभाषा में लिख-बोल नहीं सकते। आइए शर्म करें कि हमें अब किसी बात पर शर्म नहीं आती। न विदेशी, न स्वदेशी..भिन्न-भिन्न प्रदेशी। ै .


राजेंद्र माथुर के शब्दों में -
‘’यह ज़रूरी नहीं कि देर रात के गहरे सपने स्वदेशी ही हों। वे मूलत: विदेशी हो सकते हैं, लेकिन फिर भी राष्ट्रीयता के जन्म और विकास में सहायक हो सकते हैं। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि भारत के अवचेतन-विश्व में सिर्फ रामायण और महाभारत ही हों। करबला और हुसैन भी हमारे मिथक-विश्व के अंग हो सकते हैं, और हिंदुओं को भी उनके सपने आ सकते हैं। जब सिंहासन के प्रश्न नहीं थे, तब ईद और ताजिए क्या हिंदू भागीदारी के त्योहार भी नहीं बनते जा रहे थे? आजकल की तरह नेताओं और अग्रणी नागरिकों की दिखाऊ फोटो खिंचाने वाली भागीदारी नहीं, बल्कि रेवड़ी वालों और कारीगरों की ईमानदार भागीदारी। क्या सारे ताजिए ठंडे कर, सारी मूर्तियों को तोड़कर और सारे सलीबों को जलाकर ही हिंदुस्तान बन सकता है?’’

निखिल आनंद गिरि

7 टिप्‍पणियां:

Sayeed Ayub ने कहा…

बहुत ही शानदार व विचारोत्तेजक लेख है निखिल. बधाई हो! तुम्हारे कलम की यह धार बनी रहे.

सईद अय्यूब.

dineshkhanna ने कहा…

बहुत उम्दा...

aniruddha ने कहा…

जैसा की आपने कहा, गुस्से में गालियां बकने की आज़ादी तो मिलनी ही चाहिए...आपका लेख पढ़कर तो ये गुस्सा और हद से बढ़ जाता है। लेकिन अफसोस ये भी है की आपकी इस लेखनी को थोड़ा-बहुत समझ सके इस युवा भारत के बाबू दिमागों में उतनी भी क्षमता नहीं बची है।

sushma 'आहुति' ने कहा…

आपको भी स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएँ

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

देश ऐसे ही चलेगा मित्र क्योंकि हम वाकई नाली के कीड़े हैं। हमारे यहाँ प्रगति और विकास का मतलब, जिन सडको पर बसे नहीं दौड़ती वहां बस स्टाप बनवाना है। बढ़िया लेख. और हाँ, शब्द साधक सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाई !

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की ६०० वीं बुलेटिन कभी खुशी - कभी ग़म: 600 वीं ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

kyon na ham swatantrata diwas ko khush ho kar hi manayen......sochiyega...
bahut kuchh bahut achchha bhi hota hai desh me...