शनिवार, 4 मई 2013

धूप जब टेढ़ी होती है..

आप कैसे ठीक कह जाते हैं इतना..
कि हम संभालते रहते है हिज्जे..
पूर्ण विराम तक पहुंच नहीं पाते कभी,
सांस उखड़ने लगती है हर बार...

आप तो सांस भी ठीक लेते हैं..
छींकते भी ठीक ही हैं माशाअल्लाह..
महान होना का फायदा यही है,
आप कहीं भी महान बने रह सकते हैं..
मंदिर में, मस्जिद में, शौचालय में भी..
अस्पताल तक में डॉक्टर गर्व से भर जाता है
जब ठीक कर रहा होता है आपके बलतोड़..
कि ये एक महान आदमी का पिछवाड़ा है..

ये जो राजधानी बनी फिरती है..
स्वर्ग की फोटोकॉपी लगती है कभी-कभी..
यहां महान आदमी  विचरते हैं लाल बत्ती में..
धुआं छोडते ग़ायब हो जाते हैं देवता..
आम आदमी भी चलता है यहां आसमान में..
और टोकन लेने पर गायब हो जाता है पसीना..

आप ठीक कहते थे अक्सर
किताबों को उलटते-पलटते..
पुस्तकालय किसी दूसरी ग्रह का शब्द लगता है..
लाइब्रेरी एक आसान शब्द है..
जीभ अटकती नहीं कहीं भी..
महानता का आभास होता है..

धूप जब टेढी होती है..
तीखी और गुस्सैल भी..
आप सूरज से बचकर निकलते हैं..
कोई क्रीम लगाते हैं चेहरे पर..
और सूरज का सामना करने लगते हैं..
हमारे पास सूरज नहीं उतना..
कि हम सामना करें सूरज का..

किसी ने सिखाई ही नहीं ये तमीज़..
कमीज़ पहनना ही काफी नहीं है..
पैंट के भीतर होनी चाहिए कमीज़..
आपने ठीक ही कहा,
जूते पॉलिश होने चाहिए
मगर जूता भी होना चाहिए
पॉलिश के लिए सज्जनों...

हमें सिखलाया गया था रंग के बारे में..
कि ख़ून और पानी दो अलग रंग हैं..
पानी बहता है तो खुशी आती है..
खून बहता है तो खुशी जाती है..

आपको क्या सिखलाया गया था..
कौन-सी किताबें पढी थी आपने..
कि प्यास ख़ून से बुझती है..
और पानी बहता है पैसे की तरह ..
खून के धब्बे मिटाने में..
चाहे धब्बा कितना भी पुराना क्यों न हो...

चौरासी या दो हजार दो के धब्बे,
मिटाए जा सकते हैं अदालतों में...
तीस-चालीस-हजार बरस बाद भी..

निखिल आनंद गिरि

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

जिसके हाथ में पद और पावर है ..
किसी समय वो कुछ भी कर सकता है ..
बस हम मूकदर्शक की तरह देखते रहेंगे !!

Prashant Suhano ने कहा…

सोचने पर मजबूर करती है ये कविता.. झकझोर कर रख देती है...
क्या हो जाता है एक इंसान जब कुछ बन जाता है.. जबकि कुछ बदलता तो नहीं.. वो तो इंसान ही रहता है ना....