बुधवार, 26 सितंबर 2012

सस्ते अंडे देने वाली मुर्गियों में भी भगवान है..

क़रीब पंद्रह-सोलह साल पुरानी बात याद आ रही है। किराने की दुकान पर घरेलू सामान ख़रीदने के लिए जाने से पहले एक कागज़ के पुर्ज़े पर सभी सामानों के नाम वगैरह लिख कर झोला टांगते थे और सामान  ले आते थे। सबसे सस्ती मिलती थी अगरबत्ती। परनामी अगरबत्ती। बीस रुपये में पूरा बंडल कम से कम दस। उससे भी सस्ती माचिस। 4-5 रुपये में पूरा बंडल। तब भगवान पर बहुत प्यार आता था। सिर्फ बीमारी या दुख के दिनों में ही नहीं, हर तरह के दिन में। इस बार समस्तीपुर में घर पर था तो अगरबत्ती खत़्म हो गई। बाज़ार में गया तो अगरबत्ती का बंडल 120 रुपये का हो चुका था। अचानक आटे के दाम याद आ गए। पांच किलो 110 रुपये में। सही किया कि भगवान से प्यार का रिश्ता कम कर लिया। पेट में रोटी मिले, उसके बाद ही अगरबत्ती जलाने का सुख सुख जैसा लगता है। रोटी के साथ दाल के बजाय मैं अंडे खाना ज़्यादा पसंद करुंगा। उबले हुए दो अंडे दिल्ली में 12 रुपये के मिलते हैं। बिहार में भी 10 रुपये लगते हैं।  दाल कहीं भी 80 रुपये से कम की नहीं मिलती। दाल के साथ गैस का ख़र्च भी है। पानी का ख़र्च भी है। अंडे तो उबले हुए ही मिलते हैं। मैं मुर्गियों को अगरबत्ती दिखाना चाहूंगा। मुझे मुर्गियों में भगवान दिखने लगे हैं। वो न होतीं, तो हमारी रोटियां महंगाई के इस दौर में बेवा हो जातीं। रोटियों की मांग का सिंदूर है अंडे की भुर्जी।
ख़ैर, बचपन की इस अगरबत्ती से एक दूसरे भगवान भी याद आ गए। रांची के डॉक्टर। क़रीब 15 साल पहले एक डॉ. प्रसाद की ख़बर आई थी अख़बार में। किडनी चुराने का संगीन आरोप था। इस बार समस्तीपुर गया था तो वहां गर्भाशय घोटाले की ख़बर देखी-सुनी। ग़रीब महिलाओं के गर्भाशय चुराकर कई डॉक्टर अमीर हो गए। ज़ाहिर है, इसमें महिला डॉक्टरों के भी कई नाम थे। पूरे के पूरे नर्सिंग होम ही शामिल थे डॉक्टरी के पेशे की लुटिया डुबोने में। अब सरकारी जांच-फांच चल रही है। मगर, जिनके गर्भाशय बिना पूछे ही निकाल लिए गए, उनकी भी कोई जांच होनी चाहिए। क्या उनमें ज़िंदगी जीने की इच्छा बची होगी। पता नहीं। मैं तो अपनी बीमारी ठीक करने के इरादे से समस्तीपुर गया था। लेकिन, वहां के डॉक्टरों की ऐसी हालत देखकर घर में ही दम साधे ठीक होता रहा। दिल्ली के डॉक्टर से फोन पर सलाह ले-लेकर। क्या पता मेरा क्या निकाल लेते। 
ख़ैर, अब और किसी भगवान को याद नहीं करूंगा। वो बुरा भी मान सकता है। वक्त ही बुरा है। क्या पता गालियां भी बकता हो मुझे।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

मौसम

मुझे् एक बारिश याद है
जो मुझसे थोड़े फासले पर हो रही थी
और मैं जहां खड़ा था
वहां धूप के शामियाने थे

हालांकि मुझे भीगना था बारिश में
मगर धूप ख़ुद चलकर आई थी
मेरे पास..
तो मैंने थोड़ी देर धूप में भीगना चाहा

धूप गई थोड़ी देर में
तो चप्पलें छूट गईं उसकी
अचानक बारिश आईं
और बहा ले गई चप्पलें

मैं थोड़ी देर पहले ही धूप में भीगा था
फिर भी बारिश में भीगा
मैं बारिश में बारिश के पीछे भागा
धूप की चप्पलों के लिए

अचानक बारिश ने बदल लिया मन
मौसम ने बदल लिए शामियाने
धूप और बारिश में भीगा मैं..
अब बदल रहा हूं मौसम के हिसाब से..

 निखिल आनंद गिरि