बुधवार, 29 अगस्त 2012

उसने मुझे नज़र से था कुछ यूं गिरा दिया..

पत्थर पिघल रहा था मेरे दिल की ताब से

किसने जगा दिया मुझे हसीन ख़्वाब से


नाज़ुकमिज़ाज दिल की तसल्ली के वास्ते

हंसकर जिये हैं उसने सभी दिन अजाब-से


वो सुबह अब न आएगी बहरी जो हो गई

यूं उठ रहा है शोर, नए इनक़लाब से


उसने मुझे नज़र से था कुछ यूं गिरा दिया..

जैसे ज़मीं पे कोई गिरे माहताब से..


मैं उससे बरसों बाद भी था बे-तरह मिला

वो मुझसे खुल रहा था अगरचे हिसाब से


झोंके ने एक रेत के सब धुंधला कर दिया

नज़रों में इक उम्मीद बची थी सराब से


इंसानियत का अब कोई मतलब नहीं रहा

मैने पढ़ी थी बात ये सच की किताब से..

निखिल आनंद गिरि

14 टिप्‍पणियां:

दीपक बाबा ने कहा…

@उसने मुझे नज़र से था कुछ यूं गिरा दिया..
जैसे ज़मीं पे कोई गिरे माहताब से..


वाह बेहतरीन गज़ल.

दीपिका रानी ने कहा…

बहुत सुंदर... खास पसंद - मैं उससे बरसों बाद भी था बे-तरह मिला
वो मुझसे खुल रहा था अगरचे हिसाब से

दिगम्बर नासवा ने कहा…

उसने मुझे नज़र से था कुछ यूं गिरा दिया..
जैसे ज़मीं पे कोई गिरे माहताब से..

यूं तो सबी शेर खास पर इसका जवाब नहीं ... बहुत ही कमाल की गजल जनाब ... लाजवाब ...

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब ।

विश्व दीपक ने कहा…

उसने मुझे नज़र से कुछ यूँ गिरा दिया,
जैसे ज़मीं पे नूर/ओस गिरे माहताब से..

इंसानियत का अब कोई मतलब नहीं रहा,
मैने पढी थी बात ये सच की किताब से..

:)

आशा बिष्ट ने कहा…

bahut khoob

Arvind Mishra ने कहा…

लाजवाब

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 31/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

ravi_journalist@yahoo.com ने कहा…

वाह वाह ..मज़ा आ गया ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत गज़ल

Kuldeep Sing ने कहा…

इंसानियत का अब कोई मतलब नहीं रहा

मैने पढ़ी थी बात ये सच की किताब से..

Kuldeep Sing ने कहा…

आप की हर कृति गिल को छू देने वाली है। मैंने भी अपना ब्लौग बनाया है जिस में मैं अपनी कविता प्रकाशित करता हूं। अगर आप जैसे कविवर मेरे ब्लौग पर मेरा मार्ग दरशन करेंगे तो अच्छा लगेगा। कृप्या http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर पर आप का स्वागत करूंगा।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

वो मुझसे मिल रहा था ,अगरचे हिसाब से /मैं उससे बरसों बाद भी था बेतरह मिला. बढ़िया गजल मुद्दतों बाद पढ़ी है ऐसी गजल ,कितना है मुझपे आज भी खुदा का फजल .. .यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
लम्पटता के मानी क्या हैं ?

kanu..... ने कहा…

nikhil ji maja aa gaya..:) favorite koi nahi hai bcs sab behtareen hai....