रविवार, 20 मई 2012

''मेरे पास स्पर्म है....''

हिंदी सिनेमा की वीर्य-गाथा...'विकी डोनर'
1959 में जेमिनी पिक्चर्स के बैनर तले बनी फिल्म 'पैग़ाम' याद आ रही है। दिलीप कुमार कॉलेज की पढ़ाई में अव्वल होकर घर लौटते हैं और बड़े भाई को सहजता से बताते हैं कि वो पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए रिक्शा चलाते हैं। एक पढा-लिखा नौजवान रिक्शा चलाता है, ये सुनकर बड़े भाई (राजकुमार) को जितना ताज्जुब होता है, ठीक वैसा ही ताज्जुब फिल्म विकी डोनर में विकी की बीवी आशिमा रॉय के चेहरे पर देखने को मिला। ये चेहरा उस मॉडर्न कहलाने वाली पीढ़ी का चेहरा कहा जा सकता है, जो आधुनिकता को अश्लीलता की हद तक पचाने को तैयार है, मगर ये नहीं कि इंसान का वीर्य यानी स्पर्म भी बाज़ार का हिस्सा बन सकता है।

विकी डोनर एक ज़रूरी फिल्म है। हिंदी सिनेमा के सौ साल होने पर हमारे बीच ऐसी फिल्में हैं, जानकर गर्व किया जा  सकता है। ये किसी चर्चित मैगज़ीन में छपी उस लघुकथा की तरह है, जिसे पढा जाना मैगज़ीन पढ़े जाने जितना ही ज़रूरी है। पलायन की मारी दिल्ली में किस-किस तरह से प्रेम कहानियां और ज़िंदा रहने की कहानियां सांस लेती हैं, ऐसी फिल्में उन पर किया गया बेहतरीन रिसर्च हैं। इस दौर की कई फिल्मों की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि वे सीरियस होते हुए भी नारेबाज़ी नहीं करतीं। बेहद हल्की-फुल्की भाषा में बात करती हैं। हमारी-आपकी बोलियों में बात करती हैं।  इसीलिए, हमें अच्छी लगती हैं।

विकी डोनर एक बोल्ड और साहित्यिक फिल्म है। बाज़ार पर इतनी बारीकी से रिसर्च कर बनाई गई फिल्में हमारे सामने कम ही आई हैं। संतान पर होने वाले खर्च और उनसे जुड़ी हमारे मां-बाप की महत्वाकांक्षाएं अब किस स्तर तक पहुंच गई हैं, उसकी बानगी इस फिल्म में है। वो औलाद के पैदा होने से पहले ही उसका करियर तय कर देना चाहते हैं। अगर संतान के लिए बेहतर स्कूल, बेहतर कपड़े, बेहतर सोसाइटी, बेहतर भाषा ख़रीदकर एक 'प्रोडक्टिव कमोडिटी' (आप इसे 'कमाऊ पूत' पढ़ सकते हैं) तैयार की जा सकती है, तो क्यों न सबसे बेहतर स्पर्म (वीर्य) ही ख़रीद लिया जाए ताकि प्रोडक्ट की वैल्यू बढाई जा सके। क्यों कोचिंग संस्थानों को डोनेशन दिये जाएं कि अच्छा इंजीनियर या डॉक्टर या आईपीएस बना दो। सीधा स्पर्म ही ख़रीद लेते हैं जो शर्तिया क्रिकेटर ही बने, या वो जो भी मां-बाप चाहते हैँ। एक सौ फीसदी तय कमाऊ पूत पर ममता लुटाने का मज़ा ही कुछ और है।

अगर आप दिल्ली की किसी सोसाइटी में ही ''जन्मे और पाले-पोसे'' (BORN n BROUGHT UP) नहीं गए हैं और फिर भी दिल्ली का हिस्सा हैं, तो विकी डोनर आपकी भी कहानी हो सकती है। दिल्ली की प्रेम कहानियां कितने विकल्पों और बेफिक्री के साथ हर मोहल्ले में मिलती हैं, यहां उसका भी ज़िक्र है। पड़ोस की बड़ी होती, शोर की हद तक बात करती 'दिल्ली वाली लड़की' विकी पर बिना नियम-शर्त ''मर-मिटने'' को आतुर है, मगर विकी एक बंगाली चेहरे में ''शांतिनिकेतन'' ढूंढ रहा है। तो ऐसे में दिल्ली की लड़की का दिल नहीं टूटता। वो उसके सीने पर चढ़ कर बोलती है, इस ग़लतफहमी में मत रहियो कि तू ही एक है.....बहुत हैं लाइन देने वाले...ये इक्कीसवीं सदी के प्यार का वो स्वाद है जिसे दिल्ली के मोहल्लों से होते हुए देश भर के प्रेमी अब चखने लगे हैं। और हां, इस  विकी डोनर की प्रेमकहानी में फेसबुक भी है, इसीलिए हर हाल में ये हमारी ही प्रतिनिधि कहानी ही है।

जिस तरह दिल्ली में हर तीसरा आदमी प्रॉपर्टी डीलर है और ये मानकर चलता है कि वो शकल देखकर पहचान सकता है हर किसी को यहां ज़मीन या फ्लैट की दरकार है, ठीक उसी तर्ज़ पर  एक प्रोफेशनल ''स्पर्म  डीलर '' भल्ला (अनु कपूर) भी ''शकल देखकर बंदे का स्पर्म पहचान जाता हूं..'' कहते हुए जिस तरह के भाव चेहरे पर लाता है, वो खालिस दिल्ली के मर्द की बॉडी लैंग्वेज है। ये मर्द मॉडर्न दिखता ज़रूर है, मगर हर किसी को अपने गुमान भरे चश्मे से नाप सकता है। उसे गुमान है कि उसे अपने आस-पास की वक्त की पहचान ही नहीं है, वो उसे किसी भी क़ीमत पर ख़रीद भी सकता है। और एक पहलू से देखें तो ये सच भी है। दिल्ली के शाहरुख  खान जब से मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में ''मर्दानगी'' दिखाकर आए हैं, तब से एक ही जुमला मन  में घूम रहा है। आप किसी आदमी को दिल्ली से बाहर कर सकते हैं मगर किसी आदमी के भीतर से 'दिल्ली' को बाहर नहीं कर सकते।

मेर भीतर भी एक दिल्ली घुसपैठ कर गई है। न मैं इसमें से बाहर आना चाहता हूं, न ये मुझसे निकलना चाहती है। इस फिल्म में भी दिल्ली सिर्फ पर्दे के भीतर नहीं है। वो अचानक बाहर भी निकल आती है।
लगता ही नहीं कि अन्नू कपूर और आयुष्मान को हम किसी फिल्म के भीतर देख रहे हैं। लगता है वो हमारे मोहल्लों के आसपास ही हैं। किसी बालकनी से ताकते मिल जाएंगे। जिस बालकनी के नीचे एक बोर्ड लगा होगा 'स्पर्म ही स्पर्म'। दिल्ली के रास्ते एक दिन ये बिज़नेस हमारे बचे-खुचे गांवों तक भी पहुंच जाएगा जहां स्पर्म की टोकरी सिर पर लादे कोई आवाज़ लगा रहा होगा, 'स्पर्म ले लो, स्पर्म। एकदम ताज़ा स्पर्म ले लो भाई....''

निखिल आनंद गिरि

8 टिप्‍पणियां:

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

किसी कहानी में पढ़ा था कि मानसिक यंत्रणा से गुजर रहा एक आदमी जब अपने किसी भाई बंद को अपने वाले रास्ते पर कदम रखते देखता है तो चिल्लाकर उसे चेताता है, "भाग जा यहाँ से, दूर बहुत दूर| नहीं तो तू भी यहीं गुम हो जाएगा|"
आख़िरी पैरा पढने के बाद मन तो करता है कि चिल्ला दूं, लेकिन चुप रह जाता हूँ| दिल्ली छूटती नहीं है बंधू ..
फिल्म देखने लायक है और तुम्हारी रिपोर्टिंग पढने लायक|

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - बामुलिहाज़ा होशियार …101 …अप शताब्दी बुलेट एक्सप्रेस पधार रही है

himani ने कहा…

आपको तो फस्र्ट शो देखना चाहिए था ताकि ये समीक्षा हमें पहले पढ़ने को मिल जाती

Arvind Mishra ने कहा…

इस फिल्म पर आपके विचार रोचक लगे

Vivek Rastogi ने कहा…

अभी यह फ़िल्म देखना बाकी है, जल्दी ही देखते हैं, अब फ़िल्म देखना और रोचक होगा आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद

निखिल आनन्द गिरि ने कहा…

हिमानी जी,

अगली बार आप फर्स्ट शो का इंतज़ाम ज़रूर कर दीजिएगा...

Hashmi ने कहा…

very nice

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बढ़िया समीक्षा की है ...