शनिवार, 29 दिसंबर 2012

प्रलय का इंतज़ार..

आइए जंतर-मंतर पर जमा हों..
और भीतर छिपे मर्दों को फांसी दें..
सरकार के पास बहुत पैसा है..
पुलिस है, गोलियां हैं..
वो घेरा बनाकर..
आंसू गैस छोड़ेगी,
रोएगी हमारे लिए..
ख़ज़ाने लुटाएगी मुआवज़े के नाम पर...

हमारे भीतर के 'मर्द' दिल्ली पर राज कर रहे हैं..
हमारी बहन, बेटी, प्रेमिकाएं सिंगापुर जा-जाकर..
तिल-तिल मर रही हैं..

आप अब भी प्रलय का इंतज़ार कर रहे हैं?

निखिल आनंद गिरि

 

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

''मज़ाक़'' की भी हद होती है, ज्ञानोदय !!

नवंबर 2012 का 'नया ज्ञानोदय' हाथ में है। इस अंक में जितेंद्र भाटिया ने नोबेल विजेता साहित्यकार मो यान की कहानी का अनुवाद किया है। कहानी इतनी बेहतरीन है कि अनुवाद की ख़बसूरती पर ध्यान बाद में जाता है। वर्तनी पर और बाद में। मगर 'नया ज्ञानोदय' में इतनी ज़्यादा अशुद्धियां हो तो सिर्फ कहानी पढ़कर संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। ऐसी पत्रिकाओं से उम्मीद रहती है कि वो भाषा का ज्ञान बढ़ाने में मदद करेंगी। मगर, नुक़्ते ने सारा खेल ख़राब किया है। या तो नुक़्ते लगाने ही नहीं थे और लगाने थे तो दोबारा फिल्टर किया जाना चाहिए था।

अब कहानी का शीर्षक ही देखिए। मज़ाक की भी हद होती है, शिफू! जब 'ज़' वाला एक नुक्ता लग सकता है तो  'क' को तो अफसोस रह ही जाएगा ना। और फिर दो नुक़्ते लगा देने में कितनी रोशनाई ही ख़र्च हो जाती। नुक़्ते को लेकर ऐसी ग़लतियां इस लंबी कहानी में कई जगह है।
उसे काम मिला एक कारख़ाने में, जहां देखा जाए तो उसकी 'जिन्दगी' किसी किसान से बुरी नहीं थी। इस 'ख़ुशक़िस्मती' के लिए डिंग अपने समाज का शुकग्रुज़ार था...(पेज 22)
अगर ख़ुशक़िस्मती में सही-सही नुक़्ते लग सकते हैं, तो 'ज़िंदगी' से नुक़्ता क्यों ग़ायब है?

इसी पन्ने पर 'फ़ौज़ी' शब्द में एक नुक़्ता बेवजह डाल दिया गया है। नुक़्ता प्रयोग न करना भूल है, मगर ग़लत जगह नुक़्ता लगा देना अपराध की तरह है।
भीड़ के समूचे शोर के बीच अंडे देते वक़्त 'मुर्गियों' की कुड़कुड़ाहट की तरह कुछ औरतों के स्वर साफ़ सुने जा सकते थे। (पेज 23)
जब नुक़्ता लगाना ही है तो 'मुर्ग़ियां' भी इसकी हक़दार हैं। और अगले पैरा में 'कारख़ाना' भी।
छंटनी की पहली ख़बरों के फैलते ही वह 'कारखाने' के मैनेजर से मिलने गया था।
इसी पेज पर एक और लाइन है - 'उसी वक़्त एक सफ़ेद रंग की आधुनिक चिरोकी जीप हॉर्न बजाती हुई गेट के भीतर 'दाखिल' हुई'। यहां भी जीप को नुक़्ते के साथ 'दाख़िल' होना चाहिए था। ख़ैर...

पूरी क़िताब की बात ही छोड़ दीजिए, 21 पन्नों की इस लंबी और अनोखी कहानी में ही नुक़्ते से जुड़ी सैकड़ों ग़लतियां हैं। ध्यान दिलाना मुझे इस लिए ज़रूरी लगा क्योंकि मैंने इस क़िताब को राजधानी दिल्ली के सबसे मशहूर बुद्धिजीवियों से लेकर गांव के रेलवे स्टेशनों तक बिकते देखा है। सो, इसमें छपा हर शब्द भाषा की हर कसौटी पर माप-तौल कर बाहर आना चाहिए। वरना एक से बढ़कर एक पत्रिकाएं बिना किसी बड़े बैनर के भी शुद्ध वर्तनी के साथ छप-बिक रही हैं। यूं भी हिंदी में उर्दू और फ़ारसी के शब्दों के इस्तेमाल को लेकर कन्फ्यूज़न बहुत ज़्यादा है। अगर कन्फ्यूज़न दूर न किया जा सके तो बेहतर हो कि नुक़्ते लगाए ही न जाएं। कम से कम ग़लत जगह तो न ही लगाएं जाएं।

'नतीज़तन' (पेज 26), 'ख़ुशफहम' (पेज 28) , 'शिनाख्त' , 'फैक्टरी', 'मुसाफिरों', 'हरफनमौला', 'सख्त' (सभी पेज 29), 'तफरीह', 'तूफान', 'ज़ायकेदार' (सभी पेज 30), 'क़रतब', 'दिलक़श', 'फिकरे' (पेज 32), 'अक्स', 'ख़ुशमिजाज़ी'  सिर्फ टाइपिंग की ग़लतियां नहीं कही जा सकतीं। और अगर सिर्फ टाइपिंग की ग़लतियां भी है तो मेरा ख़याल है टाइपराइटर बदल  देना चाहिए।

माथे की बिंदी बाथरूम की दीवार पर चिपकी दिखे, तो न माथा ख़ूबसूरत दिखता है और न ही दीवार।

(लेखक ने हिंदी की क़िताबी पढ़ाई आठवीं में ही छोड़ दी थी। इसीलिए हिंदी को बेहतर करने के लिए ऐसी ही दो-चार क़िताबों का सहारा है। भावनाओं को समझिए।)

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

माई गे माई..एफडीआई..

आई रे आई, एफडीआई...
माई गे माई, एफडीआई..
दादा रे दादा, एफडीआई..

हथिया पे आई..
साइकिल पे आई..
लल्लू के, कल्लू के
दुर्दिन मिटाई..
आई रे आई, एफडीआई..

बटुआ में आई,
जै काली माई
व्हाइट हाउस वाली
काली कमाई..
आई रे आई, एफडीआई...

अमरीकी राशन
जियो सुशासन
खेती लंगोटी में
बिक्री में टाई..
आई रे आईएफडीआई...

खुदरा किराना..
डॉलर खजाना..
चड्डी में, टट्टी में
सोना हगाई..
आई रे आई, एफडीआई...

उठा के कॉलर,
घूमेगा डॉलर..
खेलेगा रुपिया,
छुप्पम छुपाई
आई रे आई, एफडीआई...
 
माया रे माया
नाटक रचाया
दद्दा मुलायम
चाभो मलाई..
आई रे आई, एफडीआई..
समाजवाद माने एफडीआई...
दलितवाद याने एफडीआई...

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

डबिंग वाली हिंदी बोलते पोगो पीढ़ी के बच्चे..

लिपि और उसकी दुनिया
ढाई साल की लिपि फोन पर 'मछली जल की रानी है' सुनाती है तो फोन के दूसरी तरफ अपने नन्हे हाथों से परफॉर्म भी कर रही होती है। पिछली छुट्टियों में उसे इस कविता के साथ एक्टिंग करना सिखा आया था। मैं देख नहीं पाता, मगर आख़िरी लाइन 'बाहल निकालो मल जाएगी' में जब उसकी आवाज़ धीमी होती है तो मेरा मन ताली बजाने का होता है। वो तालियों की ज़बान नहीं समझती, मगर मैं फोन पर 'पुच्ची' देने को कहता हूं तो उधर से एक गीली-सी मीठी आवाज़ फोन पर आ जाती है।

मैं पिछले कई सालों से टेलीविज़न में नौकरी कर रहा हूं, मगर शर्तिया कह सकता हूं कि लिपि रोज़ाना मुझसे ज़्यादा टीवी देखती है। ज़्यादा ध्यान से देखती है। 'छोटा भीम' उसका फेवरेट सीरियल है। ये उसने कभी कहा नहीं है, मगर सारा घर जानता है। आज तक-फाज तक, सीएनएन-फीएनन, इल्मी-फिल्मी कोई भी चैनल चल रहा हो, लिपि अगर टीवी के आसपास है तो सबको 'छोटा भीम' देखना ही पड़ता है। हम उसकी तरह रो-रोकर अपने प्रोग्राम के लिए ज़िद नहीं कर सकते। वो कर सकती है। करती है। एक ऑडिएंस अवार्ड इन बच्चों के लिए भी होना चाहिए। छोटा भीम की तरह हवा में एक काल्पनिक लड्डू उछालकर वो अगल-बगल के लोगों पर मुक्का चलाती है। छोटा भीम, डोरोमन, ढोलकपुर उसकी दुनिया का हिस्सा हैं। इस दुनिया को हम किसी अजनबी की तरह निहारते हैं, वो बेरोकटोक घूमते हैं। केबल टीवी ने बच्चों को वक्त से पहले ही दुनिया दिखानी शुरू कर दी है।

दक्ष का रूटीन चार्ट
दक्ष छह साल का है। उसे 'छोटे बच्चे' बहुत पसंद हैं। कार्टून की दुनिया भी। वो भी इस दुनिया का हिस्सा है। लिपि से थोड़ा सीनियर। मगर सीनियर होने का कोई घमंड नहीं।  उसे इस दुनिया ने सोचने का नया तरीका सिखाया है।  वो जब पांच साल का था तो 'जी-वन' (रा-वन के शाहरुख) बना घूमता था। थक जाने पर बैट्री से रिचार्ज हो जाता था। सोते-सोते 'दुश्मन' की तलाश में उठ बैठता और सिग्नल मिलने की एक्टिंग करता। वो बड़ा होकर भी जी-वन ही बनेगा और दुश्मनों को ख़त्म कर देगा। उसे कोलावरी का पूरा डांस कंठस्थ याद है। वो हफ्ते में पांच दिन स्कूल जाता है। पांचों दिन की ड्रेस अलग-अलग है। आज उसे कुंगफू की ड्रेस पहनकर जाना है। वो बहुत खुश है, उतावला है। उसकी मम्मी ने उसकी ड्रेस के ऊपर स्वेटर पहना दिया है। इस वजह से उसकी कुंगफू की ड्रेस किसी को नज़र नहीं आएगी। इस बात से वो बहुत दुखी है। वो मुझे अपनी 'चित्रा मिस' की कहानियां सुनाता है। 'मिस' उसे होमवर्क ठीक से करने पर कैडबरी देती है। मुझसे कहता है, 'मामा, मंडे को ऑफिस मत जाओ, मैं अपनी मैम से कहके आपका एडमिशन यहीं स्कूल में करा दूंगा, फिर दोनों साथ ही काम पर जाएंगे स्कूल वैन में!' । दक्ष अपने दोस्तों के बारे में भी बताता है। मम्मी-पापा के बारे में बताता है, जिन्हें मैं पहले ही से जानता हूं। पापा जब डांटते हैं तो एक कागज़ पर लिख देता है, 'पापा गुस्सा करते हैं, अच्छे नहीं हैं।'। मैं प्यार कर लेता हूं तो लिखता है, 'मामा बहुत मज़ाकिया हैं।'
नानू के कंधे पर 'जी-वन' बनने की कोशिश

सबसे छोटे उस्ताद
मैं 2001 तक अपने घर में सबसे छोटा था। जब तक सेतु नहीं आया, मंगल पांडे (निकनेम) नहीं आया, दक्ष या लिपि नहीं आए। मुझे लंबे वक्त तक ये दुख था कि मुझे गांव या घर जाने पर सबके पांव छूने पड़ते थे। अब ये बच्चे मेरे पांव छूते हैं। उनके मम्मी-पापा ज़बरदस्ती ऐसा करने को कहते हैं। मैं बड़ा हो गया हूं। होना नहीं चाहता। उनकी बातें सुनना चाहता हूं, सीखना चाहता हूं। उनके जैसा रहना चाहता हूं। कोई दोबारा मुझे बचपन दे और चश्मा पहनकर पूछे, 'बड़े होकर क्या बनना चाहते हो'। तो मैं कहूंगा बच्चा बनना चाहता हूं। बड़ों की दुनिया में सीखने को कुछ नहीं है। क़िताबें पढ़-पढ़कर ज्ञान बढाया जा सकता है, रिसर्च की जा सकती है, बेदाग़ नहीं हुआ जा सकता। मैं दोबारा बेदाग़ होना चाहता हूं। नींद आए तो थपकी के साथ सोना चाहता हूं। हवा में झूठमूठ का लड्डू उछालकर ताक़तवर होना चाहता हूं। टीवी पर सिर्फ कार्टून देखने के लिए लड़ना चाहता हूं।

 हालांकि इस टीवी ने बच्चों की हिंदी का कूड़ा भी किया है। पोगो चैनल पर बच्चे फिर को 'फ़िर', फूल को 'फ़ूल', फेंकना को 'फ़ेकना' कहते हैं। ज़ाहिर है, पोगो चैनल के क्रियेटिव हेड कोई बच्चे नहीं हैं। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए। अगर हिंदी में ठीकठाक कहानियां  या बोलियां नहीं सिखा सकते तो सिर्फ अंग्रेज़ी में ही शो दिखाइए। डबिंग करने की ज़रूरत ही क्या है। हमारे बच्चे डबिंग वाली हिंदी सीखकर बड़े हो रहे हैं। क्या हम अपनी नई पीढ़ी को कार्टून बनाकर छोड़ेंगे? क्या ये हमारे लिए सोचने का सही वक्त नहीं है?

(राष्ट्रीय अख़बार जनसत्ता ने भी इस लेख को अपने संपादकीय पन्ने पर जगह दी है...)
निखिल  आनंद गिरि

रविवार, 4 नवंबर 2012

एक डरे हुए आदमी का शब्दकोष

मेरा परिचय एक ऐसे आदमी से है,
जिसकी प्रेमिका मेज़ पर पड़ा ग्लोब घुमाती है
तो वो भूकंप के डर से
भागता है बाहर की ओर
पसीने से तरबतर,

बाहर खुले मैदान नहीं है...
बाहर लालची जेबें हैं लोगों की
जेब में ज़बान है और मुंह में पिस्तौलें...
बाहर कहीं आग नहीं है
मगर बहुत सारा धुंआ है..
गाड़ियों का बहुत सारा शोर है
जैसे पूरा शहर कोई मौत का कुंआ है...

मेरा परिचय एक ऐसे आदमी से है
जो शहर में अपनी पहचान बताने से डरता है
और गांव में अब कोई पहचानता नहीं है....
सिर्फ इसीलिए बचा हुआ है वह आदमी
कि नहीं हुए धमाके समय पर इस साल...
कि कुछ दिन और मिले प्यार करने को...
कुछ दिन और भूख सताएगी अभी...

उसने हाथ से ही उखाड़ लिया है
दाईं ओर का आखिरी दुखता दांत
सही समय पर दफ्तर पहुंचना मजबूरी है
और दानव डाक्टर की फीस से बचना भी ज़रूरी है....
दुखे तो दुखे थोड़ी देर आत्मा...
बहे तो बहे थोड़ी देर खून....
अपरिचित नहीं है ख़ून का रंग

अभी कल ही तो कूदा था एक स्टंटमैन
पंद्रह हज़ार करोड़ में बने एक मॉल से...
और उसकी लाश ही वापस आई थी ज़मीन पर...
पंद्रह हज़ार के गद्दे बिछे होते ज़मीन पर
तो एक स्टंटमैन बचाया जा सकता था...
मगर छोड़िए, इस बेतुकी बहस को
कविता में जगह देने से
शिल्प बिगड़ने का ख़तरा है...

तो सुनिए, इस बुरे समय में...
एक डरे हुए आदमी के शब्दकोष में
लोकतंत्र किसी दूसरी ग्रह का शब्द है...
तो सुनिए, इस बुरे समय में...
एक डरे हुए आदमी के शब्दकोष में
लोकतंत्र किसी दूसरी ग्रह का शब्द है...
जिसका अर्थ किसी हिंदू हिटलर की मूंछ है....
और उसके दांतों से वही महफूज़ है...
जिसके शरीर पर जनेऊ है
और पीछे एक वफादार पूंछ है...

डरा हुआ आदमी सड़क पर देखता सब है
कह पाता कुछ भी नहीं शोर में
सड़क पर जल उठी लाल बत्ती
एक भूखा, मासूम हाथ
काले शीशे के भीतर घुसा
भीतर बैठे कुत्ते ने काट खाया हाथ
कब कैसे पेश आना है
ख़ूब समझते हैं एलिट कुत्ते

एक डरे हुए आदमी के शब्दकोश में
गांव सिर्फ इसीलिए सुरक्षित है
कि वहां अब भी लाल बत्ती नहीं है
दरअसल उस डरे हुए आदमी की ज़िंदगी
भिखारी की फटी हुई जेब है
ख़ाली हो रहे हैं दिन-हफ्ते
और भरे जाने का फरेब है...

एक डरे हुए आदमी की ज़िंदगी
उस आदिवासी औरत के पेट में
पल रहे बच्चे का पहला रुदन है...
जो गांव की सब ज़मीन बेचकर
पालकी में लादकर
उबड़-खाबड़ रास्तों से लाया गया
शहर के इमरजेंसी वार्ड में
जिसने एक बोझिल जन्म लेकर आंखे खोलीं
ख़ूब रोया और मर गया....
उस डरे हुए आदमी के दरवाज़े पर
हर घड़ी दस्तक देता बुरा समय है
जो दरवाज़ा खुलते ही पूछेगा
उसी भाषा, गांव और जाति का नाम
फिर छीन लेगा पोटली में बंधा चूरा-सत्तू
और गोलियों से छलनी कर देगा...

इस बुरे समय की सबसे अच्छी बात ये है कि
एक डरा हुआ आदमी अब भी
सुंदर कविता लिखना चाहता है...

निखिल आनंद गिरि
(यह कविता पाखी के अक्टूबर-नवंबर अंक में छपी है। इसके साथ ही एक और कविता  ''लिपटकर रोने की सख्त मनाही है'' को भी पत्रिका में जगह मिली है।)

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

नो 'हिंदी-विंदी', सिर्फ 'इंग्लिश-विंग्लिश'...

अगर विदेशी लोकेशन पर शूट करना हिंदी सिनेमा के निर्देशकों के लिए मुनाफा कमाने की मजबूरी है, तब तो ठीक है, वरना 'इंग्लिश-विंग्लिश' जैसी कहानी हिंदुस्तान के किसी भी शहर में शूट की जा सकती थी। शशि (श्रीदेवी) को अपने घर में सिर्फ इसीलिए इज़्ज़त नहीं मिलती क्योंकि उसकी हिंदी अंग्रेज़ी से ज़्यादा अच्छी है। लेकिन, अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में पढ़ रहे उसके बच्चों के लिए उनकी मम्मी का अच्छी हिंदी जानना (और अंग्रेज़ी नहीं जानना) लड्डू बनाने के काम जैसा मामूली और बेकार है।
स्कूल जाती बेटी मां को बार-बार ताने देकर एहसास दिलाती रहती है कि इस सदी में अंग्रेज़ी न जानना आपको तरक्की के सूचकांक में कितने साल पीछे कर देता है।

इस फिल्म में शुरु के कई हिस्से  अच्छे तो हैं, मगर फिल्म जिस उम्मीद से देखने गया था, वहां खरी नहीं उतरी। मुझे लगा था कि बढ़िया कहानी चुनने के बाद  निर्देशिका गौरी शिंदे इसकी कहानी को भाषा के मोर्चे पर आगे ले जाएंगी। हिंदी और दूसरी देसी भाषाओं को हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी के बराबर खड़ा करने की फिल्मी कोशिश की जाएगी। वो उद्दंड बेटी जो 'तुम पढ़ाओगी मुझे 'इंग्लिश लिटरेचर'! कहकर अपनी मां को बार-बार तार-तार कर देती है, आखिर-आखिर तक अपने अंग्रेज़ी घमंड और बड़बोलेपन के लिए मां से माफी मांगेगी, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हिंदुस्तान के कई इलाकों में अंग्रेज़ी की दहशत (और श्रद्धा) में जी रहे करोड़ों हिंदी लोगों की कहानी न कहते हुए गौरी इस कहानी को सीधा अमरीका उड़ा ले गईं। फिर, अमरीका में अंग्रेज़ी सिखाने वाले एक कोचिंग सेंटर में नायिका को भर्ती करा दिया और फिल्म को ग्लोबल टच दे दिया। फिल्म हल्का-हल्का इमोशनल टच देती हुई निकल गई। एक हाउसवाइफ की कहानी बनकर रह गई जो आखिर-आखिर तक अंग्रेज़ी बोलना सीख ही जाती है और अपने घर में सम्मान पा जाती है। स्मार्ट मॉम के लिए तालियां...

मगर, हिंदी का क्या हुआ। सिर्फ टूल के तौर पर फिल्म में इसका इस्तेमाल हुआ। स्थापित तो अंग्रेज़ी ही हुई ना। और सिर्फ हिंदी ही नहीं। फ्रेंच, उर्दू जैसी दुनिया भर की तमाम ज़रूरी भाषाएं हांफती-दौड़ती,  फीस भरकर अंग्रेज़ी सीखती दिखीं। कुल मिलाकर फिल्म अंग्रेज़ी का प्रचार करती ही दिखी। किसी और भाषा को सम्मान देने के बजाय बाज़ार की उसी भाषा को सम्मान देती दिखी, जिसके आगे दुनिया भर की कई भाषाओं की बड़ी से बड़ी प्रतिभाएं पानी भरती दिखती हैं। हिंदी के दिग्गजों का तो हाल ही मत पूछिए। वो दिल्ली में हिंदी की खाते हैं और न्यूयॉर्क में हिंदी सम्मेलन के नाम पर ऐतिहासिक सेमिनार और फूहड़ बहसें करते हैं। ये फिल्म भी उसी बहस का एक विस्तार जैसा लगी। बस, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ब्रिटेन में दिया वो असल बयान भी फिल्म में जोड़ देते जिनमें वो बहुत कृतज्ञ थे कि अंग्रेज़ों ने हमें इतनी महान भाषा सिखाई।

ऐसी फिल्में प्रोपैगेंडा फिल्मों की तरह लगती हैं। जैसे सिनेमा की शुरुआत में अमरीकी नस्लवाद पर मुहर लगाती फिल्में बनती थीं या फिर बाद में हिटलर और नाज़ी वैभव का प्रचार करती फिल्में। एक ख़ास सोच से निकली हुई निर्देशक के पास फिल्म बनाने को बजट तो था मगर कहानी का कैनवस बड़ा करने का साहस नहीं था। वरना, वो देश भर के अंग्रेज़ी सिखाने वाले कोचिंग संस्थानों का एक मोंटाज ज़रूर दिखातीं जो 100 रुपये में भी अंग्रेज़ी सिखा देने का दावा करते हैं, फरेब करते हैं। वो मेरे तेलुगु दोस्त प्रदीप या तमिल दोस्त राजगोपाल सुब्रह्मण्यम का वो दर्द भी दिखाती कि कैसे उनका अंग्रेज़ी ज्ञान भी हिंदी की दबंगई के आगे काम नहीं आता। जब वो रोज़ डीटीसी की बसों में हिंदी गालियां बकते कंडक्टरों से परेशान होते हैं और मुझे अफसोस होता है कि कम से कम देश की राजधानी में इन तमाम बसों, रास्तों और दफ्तरों के तमाम साइन बोर्ड्स संविधान में दर्ज सभी भाषाओं में क्यों नहीं हो सकते। वो हमारी मौक़ापरस्ती भी दिखातीं कि कैसे हिंदी के तमाम न्यूज़ चैनल, हिंदी सिनेमा के तमाम नायक, निर्देशक, हिंदी समाज के तमाम नेता, बुद्धिजीवी और तीसमारखां अंग्रेज़ी में बात करने पर कितना गर्व महसूस करते हैं। मुझे उदय प्रकाश की कविता 'एक भाषा हुआ करती है '  अचानक याद आ रही है -

दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और
सबसे खूंखार सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और गरीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा
वह भाषा जिसे वक्त-जरूरत तस्कर, हत्यारे, नेता,
दलाल, अफसर, भंडुए, रंडियाँ और जुनूनी
नौजवान भी बोला करते हैं
वह भाषा जिसमें
लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है

बहरहाल, 'इंग्लिश-विंग्लिश' एक ठीकठाक फिल्म है। श्रीदेवी की वापसी है, मगर वो हवाहवाई नहीं हैं।
वो शशि हैं। हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी से ग्रस्त एक परिवार के बीच से बचकर अमरीका में वक्त गुज़ारने पहुंची एक एलीट हिंदी हाउसवाइफ। शशि अमरीका के किसी पार्क में बेंच पर बैठकर देखती हैं कि कैसे दोनों हाथों और मुंह से नोचकर बर्गर खाए जाते हैं। वो ये भी महसूस करती है कि उसका पति सिर्फ उसे 'हग' करने में हिचकिचाता है और बाक़ी सबसे अपनापन जताने के लिए शिद्दत से गले मिलता है।  हिस्सों में फिल्म अच्छी है, मगर फिल्म की टार्गेट ऑडिएंस शायद कोई और है। बाज़ार होती दुनिया में कमज़ोर अंग्रेज़ी की कुंठा के मारे शर्मिंदगी झेल रही हिंदुस्तानी ऑडिएंस तक ये फिल्म पहुंच भी पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है।

दिल्ली मेट्रो का एक वाकया याद आ रहा है। ट्रेन के भीतर एक बच्ची उछल-उछल कर मेट्रो के स्टेशनों के नाम पढ़ रही थी और अपनी मां को खुशी से सुना रही थी। मां खुश हो रही थी, मगर जैसे ही उसने देखा कि बेटी अंग्रेज़ी में नहीं, बल्कि हिंदी में लिखे नामों को पढ़ने की कोशिश पर खुश हो रही है, वो ज़ोर से हंसने लगी और बच्ची के पिता को बोली - 'हिंदी में पढ़ रही है, घंटे भर में  तो पढ़ ही लेगी।' मुझे लगता है, 'इंग्लिश-विंग्लिश' उस बच्ची की मां को भी दिखाई जानी चाहिए। दुनिया भर के उन तमाम स्कूलों को भी जहां मातृभाषाएं ज़बरदस्ती छुड़वाई जाती हैं। अंग्रेज़ी नहीं बोलने पर एक रुपये का जुर्माना लगाने की धमकियां दी जाती हैं।

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

तुम्हें इक झूठ कह देना था मुझसे..

दर-ओ-दीवार हैं, पर छत नहीं है।
हमें सूरज की भी आदत नहीं है।।

यहां सब सर झुकाए चल रहे हैं।
यहां हंसने की भी मोहलत नहीं है।।

तुम्हें इक झूठ कह देना था मुझसे।
मुझे सच सुनने की हिम्मत नहीं है।।

फ़क़त लाखो की ही अंधेरगर्दी !
'ये क्या खुर्शीद पर तोहमत नहीं है'!!

मैं पत्थर पर पटकता ही रहा सर।
मगर मरने की भी फुर्सत नहीं है।।

सभी को बेज़ुबां अच्छा लगा था।
मैं चुप रह लूं, मेरी फितरत नहीं है।।

(खुर्शीद = सूरज)

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

दारू और बंदूक के बीच बापू की याद...


अक्टूबर के पहले हफ्ते की बात है। दिल्ली में क़ुतुब मीनार के पास एक क्लब में भारतीय मूल की ब्रिटिश लेखिका मोनिषा राजेश की पहली क़िताब 'अराउंड इंडिया..इन 80 ट्रेन्स' के लांच पर जाना हुआ। चार महीने तक भारत की अलग अलग ट्रेनों में लेखिका के सफ़र का अनुभव इस क़िताब की ख़ासियत थी। मौके पर बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे एक पूर्व रेलमंत्री ने बातों बातों में अपनी तुलना महात्मा गांधी से कर दी। उन्होंने कहा कि जैसे गांधी को ट्रेन से उतार दिया गया था, वैसे ही उन्हें भी उतार दिया गया और फिर दोनों 'आज़ाद' हुए। गांधी को इस तरह चटखारे लेकर याद कर रहे मंत्रीजी को सुनने वालों में कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के अलावा 25-30 बुलाए गए मेहमान थे। उनके हाथों में बियर की बोतलें भी थी।


गांधी कथा कहते नारायण देसाई
इस कार्यक्रम के चंद दिन बाद ही दिल्ली महात्मा गांधी को एक और ढंग से याद कर रही थी। महात्मा गांधी के प्रिय सचिव रहे महादेव भाई देसाई के पुत्र नारायण भाई देसाई के चिर-परिचित अंदाज़ में चार दिनों की 'गांधी कथा' का आयोजन किया गया था। एक विशाल सभागार में गांधी कथा सुनने का ये अनुभव जितना अनूठा था, उतना ही यादगार भी। दरअसल, ये दिल्ली में नारायण देसाई की आखिरी 'गांधी कथा' थी। सुनने वालों में कुछ नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और सैंकड़ों लोग मौजूद रहे। हालांकि, पीने को यहां भी बोतलबंद पानी ही था, मगर 'गांधी कथा' के ज़रिए गांधी को दोबारा जीवंत करने की कोशिश काबिल-ए-तारीफ थी।

हम जैसे कोई युवाओं को गांधी का युग देखना नसीब नहीं हुआ। हां, गांधी का इस्तेमाल जगह-जगह देखते आए हैं। सेलेब्रिटी आंदोलनों में गांधी टोपी पहनने से लेकर घूस के लिए गांधी के नोट धराते लोग। आख़िरी आदमी का दुख बांटने के नाम पर लाखों-करोड़ों का फर्ज़ीवाड़ा करते लोग। ऐसे में नारायण देसाई की कही हर बात किसी दस्तावेज़ की तरह ज़रूरी हो जाती है, जिन्होंने सचमुच बापू के साथ लंबा समय गुज़ारा है। आज के संदर्भों के साथ दिल्ली की इस गांधी कथा को जोड़ना बहुत ज़रूरी और दिलचस्प हो जाता है। नारायण देसाई के मुताबिक उस वक्त भी गांधी के साथ आंदोलन में जुड़ने वाले 'चुनिंदा सक्रिय' (एक्टिव फ्यू) युवा ही थे। उन युवाओं के पास समाज के लिए एक विज़न था। वो 'व्यावहारिक आदर्शवादी' थे। मतलब ख़ुद को बदलकर समाज में वांछित बदलाव का सपना देखने वाले। आज हमारे आसपास टीवी या मीडिया ने जिस तरह के 'एक्टिव युवा' खड़े किए हैं, उनके सर पर भी आम आदमी की टोपी दिखती है। मगर, उनका चंपारण कैमरे से दिखाई देने वाली दिल्ली से ज़्यादा दूर नहीं जा पाता और नील के किसान भी बिजली बिल फाड़ने वाले मिडिल क्लास चेहरों से अलग नहीं हो पाते। वो कई रसूख वाले नेताओं पर उंगली उठाते हैं, फिर अचानक शांत हो जाते हैं फिर अचानक आंदोलन का नया शेड्यूल तय कर देते हैं। पुराना आंदोलन चार दिन में ही पुराना पड़ जाता है।

जिस कांग्रेस को खरी-खोटी सुनाने के नाम पर ही कई पार्टियां या लोग सियासत के हसीन सपने देखते नहीं थक रहे हैं, उस पार्टी का मूल चरित्र गांधी के वक्त कैसा था, ये भी जानना ज़रूरी है। लखनऊ अधिवेशन में जब कांग्रेस का अधिवेशन दूसरे कई 'संवेदनशील' मुद्दों पर रखा गया, तब बिहार से आए किसान राजकुमार शुक्ल की बात किस तरह गांधी ने सुनी और बाद में उन्हें मदद देने के आश्वासन को पूरा भी किया, उसकी तुलना मौजूदा राजनीतिक पतन को समझने में मदद करती है। इतिहास की किताबों में ये बातें कई जगह कई बार लिखी हैं। मगर, गांधी कथाओं जैसे आयोजन के ज़रिए उस दौर की प्रासंगिकता पर बहस हो और बिना ज़्यादा प्रचार-प्रायोजन के लोग सुनने भी आएं तो आश्चर्य और खुशी दोनों होती है।

गांधी ने सत्य के साथ किए अपने प्रयोगों में जो भी क़दम उठाए, उसका एक प्रतीकात्मक महत्व भी रहा। उनके आश्रम में तीन चीज़ें ज़रूरी थीं। प्रार्थना, स्वच्छता और चरखे से सूत कातना। प्रार्थना अगर आध्यात्मिक क्रांति का प्रतीक था, तो साफ-सफाई सामाजिक क्रांति का। ठीक ऐसे ही चरखे का प्रयोग स्वावलंबन और आर्थिक आज़ादी का प्रतीक कहा जा सकता है। मौजूदा राजनीति में ऐसे प्रतीक कम से कम मेरे लिए ढूंढ पाना थोड़ा मुश्किल है। ताज़ा प्रतीक लाल बत्ती और बंदूक ही नज़र आते हैं जिससे गांधी की अहिंसा के सिद्धांत का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। मसलन, बापू की जन्मभूमि पोरबंदर का ही ताज़ा उदाहरण सामने है जब वहां के कांग्रेसी सांसद विट्ठल रठाड़िया ने 50 रुपये का टोल टैक्स मांगे जाने पर बंदूक तान कर अपनी 'सहनशीलता' का परिचय दिया। चाल, चरित्र और चिंतन में सभी पार्टियों में ऐसे सांसद रोज़ देखने-सुनने को मिल रहे हैं।

गांधी कथा के दौरान खादी के ज़रिए चले देशव्यापी आंदोलन को भी समझने का मौका मिला। एक बार जब विदेशी सामान का विरोध कर रहे सत्याग्रहियों को पुलिस पकड़कर ले जाने लगी तो एक महिला ने यूं ही एक अजनबी सत्याग्रही को पास बुलाकर अपने शरीर से तमाम गहने उतारकर थमा दिए और कहा कि इसे उसके घर पहुंचा दे। सत्याग्रही ने चौंककर पूछा कि उसे एक अजनबी पर इतना अटूट विश्वास कैसे है। महिला ने हंसते हुए कहा कि ये विश्वास मेरे और तुम्हारे शरीर पर पहनी गयी खादी ने दिया है। और किसी प्रमाण पत्र की ज़रूरत नहीं है। क्या आज खादी पर आम आदमी रत्ती भर भरोसा कर सकता है। जब खादी पहने एक केंद्रीय मंत्री ये कहता मिले कि घोटाले लाखों के नहीं करो़ड़ों के हों, तब मीडिया को उस पर ध्यान देना चाहिए।

क्या आज कोई आंदोलन या कोई हुजूम एक-दूसरे पर इतना भरोसा कर सकता है। हो सकता है, नारायण देसाई की बातें उनके निजी या काल्पनिक अनुभव भर ही हों, मगर हम जिस समाज में विकसित होने का दावा कर रहे हैं, क्या ये भरोसा या सामुदायिक निर्भरता कल्पना से ज़्यादा लग भी नहीं सकते। वो भी उस दिल्ली में जहां छह महीने बाद दो अकेली बहनें मरणासन्न हालत में कमरे से निकाली जाएं या फिर किसी बुज़ुर्ग दंपती के घर में दिनदहाड़े घुसकर उन्हें गोली मार दी जाए और सब कुछ लूट लिया जाए।

गांधीजी ने कहा था कि अगर स्वराज हासिल नहीं हुआ तो वो वापस अपने आश्रम में कभी क़दम नहीं रखेंगे। 15 अगस्त 1947 के बाद गांधी कभी वापस अपने आश्रम में नहीं लौटे। शायद जिस स्वराज का सपना गांधी ने देखा था, उन्हें वो पूरा होता नहीं दिखा। मगर, दिल्ली में उनके नाम पर होने वाली गांधी कथाएं और उन्हें सुनने आने वाली दिल्ली एक उम्मीद जैसी हैं। इन्हें और प्रचार दिए जाने की ज़रूरत है। कला के दूसरे माध्यमों के ज़रिए भी गांधी कथाएं कही-सुनी जानी चाहिए। जैसे महमूद फारूक़ी या दूसरे कलाकार दिल्ली के छोटे-बड़े मंचों पर दास्तानगोई के ज़रिए मंटो या दूसरे मुद्दों को ज़िंदा रखे हुए हैं। नारायण देसाई के साथ मंच पर मौजूद संगीत मंडली ने भी कमाल की मेहनत की थी। तीन घंटे की गांधी कथा को रोचक बनाए रखने के लिए नुक्कड़ शैली में लिखे 'गांधी गीतों' को सुनना बेहद ताज़ा अनुभव था। जहां साबरमती के नीर बधाई देते, जहां खरहा डट कर लोहा ले कुत्ते से...वहां पराक्रमी बापू का आश्रम स्थित है, गांधी का आश्रम स्थित है। क्या ऐसे कठिन गीत लिखना और कंपोज़ करना कोई आसान काम हैं।

आख़िर में एक बात और पूछने या कहने का मन कर रहा है। दिल्ली में कैसे भी साहित्यिक, राजनैतिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, दर्शक दीर्घा में कुछ बुद्धिजीवियों के चेहरे कभी नहीं बदलते। वो हर जगह नज़र आ जाते हैं। या तो उन्हें दिल्ली में रहते हुए भी फुर्सत बहुत है या फिर बुद्धिजीवी बने रहना उनकी हॉबी बन गई है।

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

पान की पीक से पॉपकॉर्न तक...सिनेमा ही सिनेमा

फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर सिर्फ जहाज में ही नहीं जाते...
मेरा बचपन बिहार (और झारखण्ड) के अलग-अलग कस्बों में बीता। पिताजी पुलिस अधिकारी रहे हैं तो अलग-अलग थानों में तबादले होते रहे और हम उनके साथ घूमते रहे। इन्हीं में से किसी इलाके में पहली फिल्म देखी होगी, मगर मुझे ठीक से याद नहीं। हाँ, फिल्म देखने जाने के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद हैं, जिन्हें बताना पहला अनुभव जानने से कम ज़रूरी नहीं। क्योंकि सिनेमा के सौ साल का सफर उन्हीं सिनेमाघरों में हम और आप जैसे तमाम दर्शकों के होते हुए गुज़रा है।


मैं शायद छह या सात साल का रहा होऊंगा जब पिताजी के किसी 'इलाके' में 'सूरज' फिल्म लगी थी। हमारे परिवार के लिए फिल्म देखने का मतलब ये होता था कि टिकट पिताजी से लें। मतलब, एक सादी पर्ची (पान के साथ चूना दिये जाने जैसी) पर पिता जी कुछ लिख भर देते थे और हम आराम से हॉल में जाते और हॉल का मैनेजर पर्ची देखते ही पूरे 'सम्मान' से सीट देकर हमें फिल्म देखने देता। मैं तब न तो फिल्म समझता था, न फिल्म देखने के लिए फिल्म देखने जाता था। घर में सबसे छोटा था, तो जो सब करते वही करना ही होता था। ऐसे ही पर्चियों वाली हमने कई फिल्में देखीं। गाइड, मर्दों वाली बात, गंगा-जमुना, गंगा किनारे मोरा गाँव और फिर बाद में मोहरा तक। ये सब वैसे ही पर्ची लिखा-लिखा कर सीधा हॉल में प्रवेश करने वाली फिल्में थीं। हमारी तरफ भोजपुरी फिल्में ख़ूब लगती थीं, और उन फिल्मों के बारे में जानने के लिए हमें किसी ब्लॉग, रिसर्च पेपर या समीक्षा नहीं देखनी पड़ती थी। गाँव भर की बुआ, चाची, दीदी को हर फिल्म में नाम के साथ सब कुछ याद रहता था। भोजपुरी स्टार कुणाल सिंह हमारे बचपन के महानायक थे। वो जितेंद्र से मिलते-जुलते लगते थे तो मुझे जितेंद्र की फिल्में भी अच्छी लगती थीं। लखीसराय का अनुभव सबसे यादगार था, जहाँ एक बार पिक्चर शुरू हो गई और हम बाहर से एक बेंच लाए और फिर पिक्चर देखने बैठे।

तब हमारे घर टीवी नहीं हुआ करता था। रविवार को चार बजे शाम में फिल्म आती थी और हम देखने के लिए पड़ोस में जाते थे। ऐसे देखी गई पहली फिल्मों में से थी 'एक चादर मैली सी', 'एक दिन अचानक' और 'पार्टी'। आप समझ सकते हैं कि 'गंगा किनारे मोरा गाँव' तक से 'पार्टी' तक एक ही बचपन में देखने से सिनेमा कितनी गहराई से भीतर घुस रहा था।

जब राँची में स्कूल के दोस्तों के साथ पहली बार टिकट के पैसे चुकाकर फिल्म देखनी पड़ी तो लगा जैसे कोई गुनाह कर रहे हैं। तब तक 'पुलिसिया पहचान के नाम पर फिल्म देखना बुरा है', समझ आने लगा था। तब शायद पहली देखी फिल्म 'गॉडजिला' थी। बाद में एनाकान्डा, मोहब्बतें, गदर वगैरह-वगैरह। फिर जमशेदपुर गए तो वहाँ बैचलर लाइफ शुरु हुई। एक दोस्त ने पहली बार सुबह वाला 'शो' दिखाया। फिर तो सिनेमा आदत बन गया। हर नई रिलीज़ देखना ही देखना था। जमशेदपुर के बसन्त टॉकीज़ (जो अब नहीं रहा) में पाँच रुपये और ग्यारह रुपये के टिकट हुआ करते थे। पाँच रुपये की टिकट के हिसाब से साल में सौ शो देखने के भी लगभग पाँच सौ रुपये ही खर्च होते थे। इसीलिए सभी 'तरह' की फिल्में अफॉर्ड हो जाती थीं। कला के लिए जागरुक शहर जमशेदपुर में फिल्म महोत्सवों का चस्का लगा, जो अब तक कायम है।

फिर, दिल्ली आए तो पहली फिल्म देखी 'ओंकारा'। जामिया से नेहरु प्लेस तक पैदल चलकर तीस रुपये की टिकट पर। फिर एक महिला-मित्र के साथ मॉल गए, कोई फालतू सी फिल्म देखने। इतना महँगा पड़ा कि साथ देखने से जी भर गया। जमशेदपुर और बचपन बहुत याद आया। फिर देखा कि उन्हीं फिल्मों के 12 बजे से पहले वाले शो सस्ते होते हैं। तो आज तक दिल्ली में सुबह जल्दी उठने का सिर्फ यही मकसद होता है। कभी-कभी जान-बूझ कर देर से उठता हूँ, जब किसी ख़ास के साथ पिक्चर हॉल जाना हो और पॉपकॉर्न खाते हुए पिक्चर देखनी हो।

(ये लेख रेडियोप्लेबैक इंडिया वेब पोर्टल के लिए लिखा गया था..वहां जाकर भी पढ़ सकते हैं..इस पोस्ट के साथ लगाई गई दो तस्वीरें मेरे कैमरे से ली गई हैं..)

बुधवार, 26 सितंबर 2012

सस्ते अंडे देने वाली मुर्गियों में भी भगवान है..

क़रीब पंद्रह-सोलह साल पुरानी बात याद आ रही है। किराने की दुकान पर घरेलू सामान ख़रीदने के लिए जाने से पहले एक कागज़ के पुर्ज़े पर सभी सामानों के नाम वगैरह लिख कर झोला टांगते थे और सामान  ले आते थे। सबसे सस्ती मिलती थी अगरबत्ती। परनामी अगरबत्ती। बीस रुपये में पूरा बंडल कम से कम दस। उससे भी सस्ती माचिस। 4-5 रुपये में पूरा बंडल। तब भगवान पर बहुत प्यार आता था। सिर्फ बीमारी या दुख के दिनों में ही नहीं, हर तरह के दिन में। इस बार समस्तीपुर में घर पर था तो अगरबत्ती खत़्म हो गई। बाज़ार में गया तो अगरबत्ती का बंडल 120 रुपये का हो चुका था। अचानक आटे के दाम याद आ गए। पांच किलो 110 रुपये में। सही किया कि भगवान से प्यार का रिश्ता कम कर लिया। पेट में रोटी मिले, उसके बाद ही अगरबत्ती जलाने का सुख सुख जैसा लगता है। रोटी के साथ दाल के बजाय मैं अंडे खाना ज़्यादा पसंद करुंगा। उबले हुए दो अंडे दिल्ली में 12 रुपये के मिलते हैं। बिहार में भी 10 रुपये लगते हैं।  दाल कहीं भी 80 रुपये से कम की नहीं मिलती। दाल के साथ गैस का ख़र्च भी है। पानी का ख़र्च भी है। अंडे तो उबले हुए ही मिलते हैं। मैं मुर्गियों को अगरबत्ती दिखाना चाहूंगा। मुझे मुर्गियों में भगवान दिखने लगे हैं। वो न होतीं, तो हमारी रोटियां महंगाई के इस दौर में बेवा हो जातीं। रोटियों की मांग का सिंदूर है अंडे की भुर्जी।
ख़ैर, बचपन की इस अगरबत्ती से एक दूसरे भगवान भी याद आ गए। रांची के डॉक्टर। क़रीब 15 साल पहले एक डॉ. प्रसाद की ख़बर आई थी अख़बार में। किडनी चुराने का संगीन आरोप था। इस बार समस्तीपुर गया था तो वहां गर्भाशय घोटाले की ख़बर देखी-सुनी। ग़रीब महिलाओं के गर्भाशय चुराकर कई डॉक्टर अमीर हो गए। ज़ाहिर है, इसमें महिला डॉक्टरों के भी कई नाम थे। पूरे के पूरे नर्सिंग होम ही शामिल थे डॉक्टरी के पेशे की लुटिया डुबोने में। अब सरकारी जांच-फांच चल रही है। मगर, जिनके गर्भाशय बिना पूछे ही निकाल लिए गए, उनकी भी कोई जांच होनी चाहिए। क्या उनमें ज़िंदगी जीने की इच्छा बची होगी। पता नहीं। मैं तो अपनी बीमारी ठीक करने के इरादे से समस्तीपुर गया था। लेकिन, वहां के डॉक्टरों की ऐसी हालत देखकर घर में ही दम साधे ठीक होता रहा। दिल्ली के डॉक्टर से फोन पर सलाह ले-लेकर। क्या पता मेरा क्या निकाल लेते। 
ख़ैर, अब और किसी भगवान को याद नहीं करूंगा। वो बुरा भी मान सकता है। वक्त ही बुरा है। क्या पता गालियां भी बकता हो मुझे।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

मौसम

मुझे् एक बारिश याद है
जो मुझसे थोड़े फासले पर हो रही थी
और मैं जहां खड़ा था
वहां धूप के शामियाने थे

हालांकि मुझे भीगना था बारिश में
मगर धूप ख़ुद चलकर आई थी
मेरे पास..
तो मैंने थोड़ी देर धूप में भीगना चाहा

धूप गई थोड़ी देर में
तो चप्पलें छूट गईं उसकी
अचानक बारिश आईं
और बहा ले गई चप्पलें

मैं थोड़ी देर पहले ही धूप में भीगा था
फिर भी बारिश में भीगा
मैं बारिश में बारिश के पीछे भागा
धूप की चप्पलों के लिए

अचानक बारिश ने बदल लिया मन
मौसम ने बदल लिए शामियाने
धूप और बारिश में भीगा मैं..
अब बदल रहा हूं मौसम के हिसाब से..

 निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 29 अगस्त 2012

उसने मुझे नज़र से था कुछ यूं गिरा दिया..

पत्थर पिघल रहा था मेरे दिल की ताब से

किसने जगा दिया मुझे हसीन ख़्वाब से


नाज़ुकमिज़ाज दिल की तसल्ली के वास्ते

हंसकर जिये हैं उसने सभी दिन अजाब-से


वो सुबह अब न आएगी बहरी जो हो गई

यूं उठ रहा है शोर, नए इनक़लाब से


उसने मुझे नज़र से था कुछ यूं गिरा दिया..

जैसे ज़मीं पे कोई गिरे माहताब से..


मैं उससे बरसों बाद भी था बे-तरह मिला

वो मुझसे खुल रहा था अगरचे हिसाब से


झोंके ने एक रेत के सब धुंधला कर दिया

नज़रों में इक उम्मीद बची थी सराब से


इंसानियत का अब कोई मतलब नहीं रहा

मैने पढ़ी थी बात ये सच की किताब से..

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आज़ाद भारत को महामहिम अमेरिका का संदेश !!


सारे जहां से अच्छा..
मैं अमेरिका हूं। मुझे गर्व है कि मैं भारत में भारत से ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण हूं। सिर्फ भारत ही क्यों, दुनिया भर में सारे देश मुझे अपनी-अपनी शिद्दत से याद करना नहीं चूकते। कुछ सिरफिरे लोग ऐसा समझते हैं कि कई देश मुझे नफरत के रिश्ते से याद करते हैं। मगर, मैं बता देना चाहता हूं कि ये सब कोरी अफवाहें हैं। नफरत प्यार का ही आखिरी सिरा है। नफरत करने वाले गुपचुप प्यार करते हैं,सच्चा प्यार करते हैं। कम से कम भारत जैसे महान देश ने तो ये साबित कर ही दिया है। अमेरिका के नाम पर गालियां लिखने वाले किसी अमेरिकी अख़बार में कॉलम भेजकर छपने का इंतज़ार करते हैं। स्वदेशी स्वदेशी की रट लगाने वाले हिंदुस्तानी एक बार अमेरिका आना मोक्ष से कम नही समझते। सारे हिंदुस्तानी बिस्मिल्लाह खान तो होते नहीं कि बनारस के नाम पर अमेरिका को ठुकरा दें। अब तो तुम्हारे यहां रामदेव है। हरिद्वार की रोटी खाता है और अमेरिका में योग सिखाने के सपने देखता है। हमने हर कदम पर तुम्हारा साथ दिया है। तुम्हें पहनने को कपड़े दिए हैं। तुम्हें खाने को नई दुकाने दी हैं। तुम्हारी हिंदी तुम जितना बोलते हो, उससे कहीं ज़्यादा तो अब हमारे यहां लोग बोलते हैं। तुम हिंदुस्तानी ख़ुद को गौर से देखो। अमेरिकन ही लगते हो कई एंगल से। तुम्हें खुश होना चाहिए। गर्व होना चाहिए खुद पर। सुपर पावर का हिस्सा हो तुम। भले ही तुम्हारे मुल्क में पावर नहीं है चौबीस घंटे। हमने जहां तक हो सका है, दुनिया का भला चाहा है। भला किया भी है। दुनिया भर में हमें हर तरह के फैसले लेने की नैतिक आज़ादी है।

अपने यहां की पॉलिटिक्स को देखो। क्या मिला तुम्हें 1947 की आज़ादी से। संसद भवन से पैदल दूरी पर रोज़ सांसदों को गाली पड़ती है। पीएम को खुलेआम गालियां पड़ती हैं। प्रेसि़डेंट को गाली पड़ती है। अंटशंट (अनशन) होते हैं। आंदोलन होते हैं। चलो, किसी को गालियां तो मिलती हैं, तुम आम लोगों को लोकतंत्र के नाम पर क्या मिलता है। अन्ना, खन्ना, रामदेव, कामदेव, कांडा, पांडा, सुज़ुकी, फुजुकी, राहुल, आउल, मोदी और बहुत सारी बकचोदी। पूछो ज़रा अपने देश में। सात समंदर पार की दूरी से कोई हमें गाली दे सकता है क्या। पूछो इन सबको एक लाइन में खड़ा करके पूछो। कौन नहीं जानता कि भारत में खाने को पूरा अन्न तक नहीं जुटता है। और जिन लोगों तक अनाज आसानी से पहुंच जाता है, उनके लिए हम बेहद फिक्रमंद हैं। वो चमचमाते लोग और वो मरियल-सा अनाज। तभी तो हमने वॉलमार्ट जैसी कई महान संस्थाएं वहां की देखभाल के लिए भेजने का मन बना लिया है।  जो सत्य है, उसे मान लेने में क्या बुरा है। हमारे बिना तुम्हारा काम चल ही नहीं सकता। हम भगवान न सही, अन्नदाता तो हैं हीं। अणुदाता भी हैं। तुम्हारे परमाणु दाता भी। और किसने देखा है कि भगवान कैसे होते हैं।

अपने न्यूज़ चैनलों को देखो। अपने अखबारों को देखो। अपने इंजीनियरों को देखो। अपने कॉल सेंटर्स को देखो। सब हमारे भरोसे चलते हैं। हमारे यहां जब सुबह होती है, तो हमारे टट्टी जाने से पहले तुम नाइट शिफ्ट में जुत जाते हो। हमारे यहां कॉल करते हो। हमें अपनी पॉलिसी बेचते हो। सॉफ्टवेयर बेचते हो। हमसे गालियां खाते हो। गालियां समझने के लिए हमारी अंग्रेज़ी ज़ुबान सीखते हो। वगैरह-वगैरह। हम चार-पांच-दस साल पहले जो प्रोग्राम या फिल्म बना चुके होते हैं, तुम उसे या तो खरीदते हो या फिर नकल करने की कोशिश करते हो। कमाते-खाते हो। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। हम तो ऐसा ही चाहते हैं। सारे खंभे हमारे होंगे, तभी तो मकान हमारा होगा।

मैं 15 अगस्त के इस मौके पर इतना ही कहना चाहता हू कि एक दिन ख़ूब याद करो अपने देश को। अपने सच्च देशभक्तों को। मगर, साल के 364 दिन मुझे मत भूलना। देश भावनाओं से नहीं रोटी से चलता है। वो रोटी तुम्हें हम देंगे। देते हैं। देते रहेंगे। जाने-अनजाने।  तुम्हारी सात पुश्तों में से किसी एक छोरे-छोरी ने डॉलर कमा लिया तो तुम ही सोचो उसकी क्या कद्र होती है। और तुम हो कि नकली नोट के पीछे पड़े हो। जाली नोट। जाली आंदोलनों जैसे। जाली देशभक्तों जैसे। दुनिया ग्लोबल हो चुकी है। इस ग्लोबल दुनिया का एक ही लालकिला है। उसे व्हाइट हाउस कहते हैं। एक ही राष्ट्रपति है। सर्वसम्मति से। तो एक बार ज़ोर से जयकारा लगाओ इंडियावालों - ज़ुबां पे इंडिया, दिल में अमरीका

कम लिखा, जादा समझना
तुम्हारा,
'सबका मालिक एक है'

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

लिपटकर रोने की सख्त मनाही है...

रात में सियारों की हुंआ-हुंआ की तरह
सुनाई देती है मेट्रो की हल्की आवाज़
पेड़-पौधों की तरह दिखते हैं
दूर-दूर तक वीरान मकान...
शिकार के लिए ढूंढने नहीं पड़ते शिकार
बाइज्ज़त होम डिलीवरी की भी व्यवस्था है...
और मुझे ये सच कहने पर चालान मत कीजिए
कि हम एक जंगल को शहर समझने लगे हैं....
ऐसा नहीं कि पहली बार लिखा गया हो ये सब
मगर ये हर भाषा में बार-बार बताया जाना ज़रूरी है

जैसे बार-बार बनाई जानी होती है दाढ़ी
याद किए जाने होते हैं आखिरी विलाप
छूने होते हैं पांव, बेमन से....
घर लौटना होता है नियम और शर्तों के बिना
बीमार होने पर वही कड़वी दवाईयां बार-बार
जैसे बार-बार बदलते बेटों के लिए
नहीं बदलते मां के व्रत
और सुनिए इस शहर के चरित्र के खिलाफ
आपको दुर्लभ दिखने के लिए रोना हो बार-बार...
तो ठूंठ पेड़ बचाकर रखिए दो-चार...
किसी से लिपटकर रोने की सख्त मनाही है...

इस शहर में छपने वाले अमीर अखबारों के मुताबिक
निहायती ग़रीब, गंदे और बेरोज़गार गांवों से...
वेटिंग की टिकट लेने से पहले मुसाफिरों को... 
ख़रीदने होते हैं शहर के सम्मान में
अंग्रेज़ी के उपन्यास...
गोरा होने की क्रीम..
सूटकेस में तह लगे कपड़े...
और मीडियम साइज़ के जॉकी....
हालांकि लंगोट के खिलाफ नहीं है ये शहर..
और सभ्य साबित करने के लिए
अभी शुरु नहीं हुआ भीतर तक झांकने का चलन...

यहां हर दुकान में सौ रुपये की किताब मिलती है
जिसमें लिखे हैं सभ्य दिखने के सौ तरीके
जैसे सभ्य लोग सीटियां नहीं बजाते
या फिर उनके घरों में बुझ जाती हैं लाइट
दस बजते-बजते...
या जैसे मोहल्ले की पुरानी औरतें कहती हैं
अच्छे या सभ्य नहीं होते 47 वाले पंजाबी..

बात-बात पर आंदोलन के मूड में आ जाता है जो शहर...
हमारे उसी शहर में थूकने की आज़ादी है कहीं भी...
गालियां बकना नाश्ते से भी ज़रूरी है हर रोज़...
और लड़कियों के लिए यहां भी दुपट्टा डालना ज़रूरी है..
जहां न बिजली जाती है कभी और न डर।

जिनकी राजधानी होगी वो जानें..
किसी दिन तुम इस शहर आओ
और कह दो कि मुझे सफाई पसंद है..
तो पूरे होशोहवास में सच कहता हूं,
डाल आऊंगा...कूड़ेदान में सारा शहर...

निखिल आऩंद गिरि

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

दिल्ली के आंदोलन को वीकएंड चाहिए, सेलेब्रिटी चाहिए...

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे..
23 जुलाई को मेट्रो में सफर के दौरान अपनी सीट के बगल में बैठे एक सज्जन पर अचानक आया मैसेज मैंने चुपके से पढ़ लिया था। किसी 'एल एम अन्नाजी' ग्रुप की तरफ से मैसेज था जिसमें अपील लिखी थी कि '24 को अन्ना दिल्ली आ रहे हैं। मोटरसाइकिल वगैरह कुछ भी हो,  भारी संख्या में दिल्ली एयरपोर्ट आकर उनका सहयोग करें। सज्जन ने चुपचाप मोबाइल बंद कर जेब में रख लिया था। मैसेज डिलीट कर दिया था।

मैं लगभग रोज़ दिल्ली मेट्रो में लंबा सफर करता हूं। अच्छा लगे या बुरा, करना ही पड़ता है। पिछले साल इन दिनों में अच्छा लगा था। सफ़र आसानी से कट जाता था। ठसाठस भीड़ में अचानक 'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना' का एक कोरस सुनाई पड़ता और फिर देशभक्ति के तमाम नारे। सबके चेहरे खिल जाते। फिर कपिल सिब्बल को जमकर गालियां पड़तीं। बूढ़े लोग युवाओं को देश की हालत समझाने लगते। सफर आसानी से कट जाता था।  इस बार मेट्रो तक में भी 'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना' का कोरस ग़ायब है। किसी ने अब तक फोन करके नहीं पूछा कि 'अन्ना के आंदोलन में गए क्या?'

भ्रष्ट और चमचे नेता सेलेब्रिटी की तरह प्रोमोट हुए जा रहे हैं। राष्ट्रपति बन रहे हैं। दिल्ली में ही नया राष्ट्रपति शपथ ले रहा है। अंग्रेज़ी हुकूमत तो हमने देखी नहीं, मगर यहां देख रहे हैं कि एक बूढे आदमी के आगे-पीछे कैसे सैंकड़ों जवान, गाड़ियां, बंदूकों की सलामी, करोड़ों रुपये बर्बाद हुए जाते हैं। दिल्ली में ही उनके मुंह पर काला कपड़ा ढंका जा रहा है। एक ही दिन। न्यूज़ चैनल के मेरे दोस्त कहते हैं  अन्ना ने आंदोलन का ग़लत दिन चुन लिया है। कोई और दिन होता तो ठीकठाक कवरेज मिल जाती। अन्ना को फायदा मिल जाता ! क्या आंदोलन भी दिन देखकर करने पड़ते हैं?

दिल्ली में हो रहा एक आंदोलन वीकएंड (weekend) का इंतज़ार कर रहा है। शायद वीकेंड में भीड़ जुटे, सेलेब्रिटी आएं। अकेले अन्ना, अकेले युवा, अकेले मीडिया कुछ नहीं कर सकता। इस देश में आंदोलन को भी सेलेब्रिटी चाहिए। ओलिंपिक की मशाल को भी सेलेब्रिटी चाहिए। कैमरे फिर कुत्ते की तरह पीछे भागते हैं। इतने अरब लोगों के लिए इतने करोड़ भगवान पहले से ही हैं। हमें लोकपाल नहीं चाहिए, हमें ज़िंदा भगवान चाहिए। यही सच है। भगवान, जो कहीं नहीं है, कभी नहीं था।

(पिछले साल हुए टीम अन्ना के आंदोलन पर मेरे विचार यहां (लोकतंत्र का अगला भाग, अंतराल के बाद) पढ़ सकते हैं...)

निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी क़रीब हैं..


मेरी मां ने आज तक कोई फिल्म पूरी नहीं देखी होगी। सती अनुसुईया, गंगा किनारे मोरा गांव जैसी अमर भोजपुरी फिल्में पूरी देखने के दौरान भी दो-तीन बार झपकी ज़रूर मार ली होगी। आप उसके सामने किसी भी दौर की अच्छी से अच्छी फिल्म लाकर रख दीजिए, फिर कुर्सी पर उसे बिठा दीजिए, फिल्म का ख़ूब बखान कीजिए कि ये सिनेमा के फलां तीसमारखां की फिल्म है वगैरह वगैरह, वो फिल्म देखने के साथ कभी दाएं, कभी बाएं ज़रूर डोलती नज़र आएगी। मां की सिनेमाई नींद के आगे किसी भी सुपरस्टार या महानायक की ऐसी की तैसी न हो जाए तो फिर कहिए। 'हाथी मेरे साथी' और 'स्वर्ग' ही हिंदी फिल्मों के नाम पर उनकी देखी गईं, बार-बार याद की गईं हिंदी फिल्में याद आती हैं। 'हाथी मेरे साथी' देखने और याद रखने का एक कारण अगर फिल्म में हाथी की मौजूदगी को मान लें तो भी 'स्वर्ग' फिल्म में सिर्फ और सिर्फ राजेश खन्ना ही वो किरदार थे, जिन्होंने मेरी मां को भी प्रभावित किया। हां, 'स्वर्ग' में गोविंदा भी मां की पसंद रहे हैं मगर राजेश खन्ना पहली पसंद हैं।

हमने वीसीआर पर घर में पहली बार स्वर्ग फिल्म एक साथ देखी थी। मैं तब स्कूल के शुरुआती सालों में पढ़ता था। मुझे याद है मेरे घर में ये फिल्म कई बार देखी जा चुकी है। वो भी सिर्फ मां की वजह से। मां को न तो वीसीआर चलाना आता है और न ही फिल्में देखने का शौक है। उसे तो ये भी नहीं पता कि कौन किस दौर में कौन सुपरस्टार हुआ है या फिर सुपरस्टार जैसी कोई चीज़ भी होती है। ये राजेश खन्ना का कोई जादू ही था कि मां उनका नाम जानती है, चेहरे से पहचानती है। जैसे बाद में मेरे टीवी या क्रिकेट देखने के शौक की वजह से वो अमिताभ को 'अमितभवा' और सचिन को 'सचिनमा' के नाम से पहचान चुकी है। और कई बड़े लोगों का नाम पूछकर कई बार देख चुका हूं, मगर उन्हें पहचानने में वो आत्मविश्वास नहीं दिखता।

बात 'स्वर्ग' की। तब समस्तीपुर में पापा ने अपनी कमाई से पहली बार ज़मीन ख़रीदी थी और हमारा घर बन रहा था। हम पापा की नौकरी की वजह से बिहार के जिस कोने में भी होते, घर में 'अपने घर' को लेकर कुछ न कुछ बात ज़रूर होती। मां 'अपने घर' को 'स्वर्ग' ही कहकर बुलाती। ये बहुत बाद में समझ आया कि सिनेमा और एक दर्शक का रिश्ता क्या हो सकता है। जिस महिला ने शायद ही कभी सिंगल स्क्रीन थियेटर में (ऊपर लिखी दो-चार फिल्मों को छोड़कर) क़दम रखा हो, शायद ही कभी मॉल या मल्टीप्लेक्स के दर्शन करने की सोच पाए, उसके लिए राजेश खन्ना घर का हिस्सा थे। इसके बाद शायद ही कुछ कहने को बचता है कि राजेश खन्ना क्यों हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहे जाते हैं। वो भी तब, जब राजेश खन्ना के गुज़रने पर 'हाथी मेरे साथी' या 'स्वर्ग' का ज़िक्र एक भी चैनल या वेबसाइट पर उनकी चुनिंदा फिल्मों में देखने को नहीं मिल रहा है। यानी एक सुपरस्टार की कामयाबी इसी में है कि उसकी दूसरे दर्जे की सफल फिल्म भी एक विशुद्ध हाउसवाइफ को उसका ऐसा फैन बना सकती है कि वो ताउम्र अपने घर का नाम उसकी एक फिल्म के नाम पर रखना चाहे।

जैसे मां की पसंद से बहू घर आए तो बेटे को उसका ख़याल रखना ही पड़ता है, ठीक वैसे ही राजेश खन्ना मेरे लिए बेहद ख़ास रहे। हालांकि मेरे लिए पहले सुपरस्टार का मतलब आज भी अमिताभ बच्चन ही हैं, लेकिन राजेश खन्ना को मैं पहला म्यूज़िकल सुपरस्टार ज़रूर मानता हूं। पहला ही क्यों, इकलौते सदाबहार म्यूज़िकल सुपरस्टार थे राजेश खन्ना। राजेश खन्ना को याद करने का मतलब बेशकीमती हिंदी गानों को याद करना है। भारतीय सिनेमा की उस विशेष परंपरा को याद करना है, जिसकी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। वो शायद दुनिया के पहले ऐसे सुपरस्टार थे, जिन्होंने सिर्फ गानों के दम पर ऐसा स्टारडम हासिल कर लिया था। शायद यही एक कमज़ोरी भी रही कि अमिताभ बच्चन झट से उनकी कुर्सी खींच पाए और किशोर कुमार रातों रात अमिताभ की आवाज़ बन गए।

राजेश खन्ना को याद करते वक्त अचानक अमेरिका का चार्ल्स मैंसन याद आता है। वो अमरीकी अपराध की दुनिया का 'कल्ट गुरु ' रहा। गुनाहों का देवता। उसने अपनी एक मायावी दुनिया बनाई थी जिसे मैंसन फैमिली कहते थे। उसके लिए रोमांस की हद के पार अपराध का वो चरम था, जिसके दम पर उसे लगता था कि जब एक दिन कयामत आएगी और सिर्फ उसी के अनुयायी जीवित बचेंगे। राजेश खन्ना ने रोमांस की दुनिया में वही 'कल्ट' पैदा किया। रोमांस के देवता। एक ऐसा भरम जो उस दौर के भारतीय हालात में हर नागरिक जीना चाहता था। उम्मीदों की आखिरी डोर थामकर ये यक़ीन बचाना चाहता था कि आज़ाद भारत में अब भी वो सुबह आनी बाक़ी है, जहां सब कुछ राजेश खन्ना की तरह पलक झपकते ही रुमानी हो जाना है। कभी-कभी ये भी लगता है कि अगर राजेश खन्ना न होते तो आज भारतीय जनमानस में जिस कदर हर सेलेब्रिटी के आगे-पीछे आंखे मूंद कर डोलने का चलन है, वो बीमारी हमारे समाज से कोसों दूर रहती। ऐसा कहते हुए मोनिका बेदी से लेकर कसाब के वकील तक याद आ रहे हैं।

अपने आखिरी दिनों में किया गया राजेश खन्ना का वो पंखे का विज्ञापन भी याद आ रहा है, जिसमें राजेश खन्ना की एक्टिंग का सबसे बुरा इस्तेमाल ये कहलवाने में हुआ कि मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता। हालांकि, ये बात बिल्कुल सच है कि राजेश खन्ना के फैन्स हमेशा बचे रहेंगे। जब तक धरती पर प्यार बचा है। जब तक भारतीय सिनेमा बचा है। जब तक गीत लिखने वालों और संगीत रचने वालों की कद्र बची है।

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 16 जुलाई 2012

कई संपादक अब चीयरलीडर होते जा रहे हैं..


राजदीप सरदेसाई
भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी हस्तियों में से एक स्व प्रभाष जोशी की 76वीं सालगिरह पर उन्हें याद करते हुए CNN-IBN के एडिटर-इन-चीफ राजदीप सरदेसाई से हुई हमारी (प्रेम भारद्वाज और मेरी) ये  बातचीत पाखी पत्रिका के प्रभास जोशी विशेषांक में छपी है...चूंकि राजदीप अंग्रेज़ी के पत्रकार हैं, तो इस पूरी बातचीत को लगभग हिंदी में उतारने का काम आपके इस ब्लॉगर साथी निखिल आनंद गिरि ने किया है..आप पढ़कर अपनी राय दे सकते हैं...


हम ये जानना चाहेंगे कि प्रभाष जोशी जिस मूड की पत्रकारिता करते थे, जिस सरोकार की,या मूल्यों की..या फिर जिनसे उनकी टकराहटें थीं..उस तरह की पत्रकारिता में उनके जाने के बाद जो वैक्यूम या शून्यता पैदा हुई है..या क्या हुआ है? वो चीज़ें बढ़ी हैं, घटी हैं...किस रूप में देखते हैं उनकी पत्रकारिता को...
देखिए, मैं..25 साल का था 1990 में और मुझे मेरे अख़बार टाइम्स ऑफ इंडिया ने तब कहा, आडवाणी जी की जो रथयात्रा थी, उसको आप रिपोर्ट कर लीजिए..समय था 1990 का और सोमनाथ से लेकर भोपाल तक मैंने वो रथयात्रा कवर की थी। उस समय पहली बार मैंने प्रभाष जोशी के जो लेख थे, उस समय, वो पढ़े और काफी प्रभावी रहे मेरे लिए। क्योंकि जिस तरह का माहौल बन रहा था, जिस तरह का, एक तरह से एक नई सोच आ रही थी, उस पर या तो ज़्यादातर लोग उस लहर में आकर उसके साथ चल रहे थे या तो हम केवल उसको देखकर रिपोर्ट कर रहे थे। प्रभाष जोशी, उस समय जिस तरह से उन्होंने उस समय पत्रकारिता की, जिस तरह के लेख लिखे, उस लहर से एक तरह विपरीत होकर, उसमें आखिर में बड़ी तस्वीर क्या है..क्या हो रहा है देश में, किस वजह से इतने लोग बाहर आ रहे हैं आडवाणी की रथयात्रा के साथ..और उस रथयात्रा और भारतीयता और राष्ट्रवाद के जो प्रश्न उठ रहे थे, उन पर जिस तरह से उन्होंने सवाल उठाये, जिस तरह के लेख लिखे, उस पर एक रिपोर्टर की हैसियत से मैं प्रभावित रहा। और फिर आप देखेंगे कि 1991-92 का जो पूरा पीरियड है, मस्जिद की डिमॉलिशन (विध्वंस) तक...लगातार उन तीन सालों में जो लेख उन्होंने लिखे, उसमे एक चीज़ साफ थी कि राष्ट्रवाद की जो उनकी एक कल्पना थी..


उस पर उन्होंने एक किताब भी लिखी बाद में...
हां, किताब भी लिखी..लेकिन जनसत्ता में जो उन्होंने उस वक्त आर्टिकल्स (लेख) लिखे, सबसे बड़ा सवाल उन्होंने यही पूछा था कि राष्ट्रवाद यानी क्या। ये नेशनलिज़्म (राष्ट्रवाद) पर जो डिबेट (बहस) होना चाहिए, वो किस तरह का डिबेट होना चाहिए। सेक्युलरिज़्म पर, धर्मनिरपेक्षता क्या है..और अच्छी बात क्या थी कि वो केवल एक इंग्लिश स्पीकिंग, वेस्टर्नाइज़्ड एजुकेटेड (अंग्रेज़ी बोलने वाले, पश्चिम से प्रभावित शिक्षाप्राप्त) जो एक क्रिटिसिज़्म (आलोचना) होती है उस मूवमेंट की, उस नज़रिए से वो नहीं लिख रहे थे। वो लिख रहे थे, वो ख़ुद एक रिलीजियस (धार्मिक) आदमी थे, He was proud of his Hinduism, वो कोई Atheist नहीं थे। तो उन्होंने...क्या कहेंगे उसको...He was rooted in the reality of India..उनका जो 40-50 साल का अपना तजुर्बा था, उन्होंने उसको लेकर जो लिखा है, मुझे लगता है शायद बहुत कम ऐसे लोग होंगे जिन्होने उस समय , उस हालात में उस तरह की writing (पत्रकारिता) की हो।
और ये करना जब उनके पर्सनल रिलेशन्स (निजी संबंध) बड़े अच्छे थे। आडवाणी जी के साथ, अटल जी के साथ...क्योंकि इमरजेंसी में उनका रोल रहा था। प्रभाष जी इन सबको जानते थे। लेकिन, मुझे लगता है कि उन्होंने पत्रकारिता में ये दिखाया कि मेरे पर्सनल रिलेशन जो भी हों, लेकिन मेरे लिखने पर उसका कोई असर नहीं होगा। और आपको मैं अगर क्रिटिसाइज़ (आलोचना) करता हूं तो मैं मेरी neutral independent position से, मुझे जो सही लगता है, उस हैसियत से करता हूं। क्योंकि एडिटर या एक कमेंटेटर की जो विशेषता होती है, कि आप जब किसी इशु (मुद्दे) पर लिखते हैं, आप उसे अपने पर्सनल इक्वेशन (निजी संबंधों) से दूर रखकर एक बड़ी तस्वीर लोगों के सामने लाने की कोशिश करते हैं। तो जिस एग्रेशन (आक्रामकता) से उन्होंने लिखा, जिस डायरेक्शन (नज़रिए) से लिखा..हालांकि, कुछ लोग कह सकते हैं कि वो उनके लिए एक 'finest hour' था। कई लोग कहते हैं कि इमरजेंसी में जिस तरह से उन्होंने जुड़कर जेपी के साथ काम किया था, वो तो बात अलग है..लेकिन उन दो-तीन सालों में जो उन्होंने लगातार लेख लिखे और जिस तरह से उन्होंने प्रश्न उठाए, एक तरह से 'That would be his finest hour' हम कह सकते हैं।


अच्छा, क्रिकेट भी तो आप दोनों के बीच कॉमन रहा होगा।
जवाब - हां, वो क्रिकेट के बहुत शौकीन थे। जब मैं उनसे पहली बार मिला तो हमने क्रिकेट पर कई बातें की। और वो मेरे पापा (दिलीप सरदेसाई) के बहुत शौकीन थे। तो, कई बार मैं जब बात करना चाहता था 91-92 में जो हो रहा था, उस पॉलिटिक्स की, और वो बात करने लगते थे क्रिकेट की। मुझे ये भी हमेशा अच्छा ही लगता था। वो शायद तब की बात है जब मैं एक बार उनके साथ एक दौरे पर गया था, शायद पीएम का दौरा रहा होगा या ऐसा ही कुछ, तो मैं लगातार उनसे बात करना चाहता था पॉलिटिक्स के बारे में और वो बात करना चाहते थे क्रिकेट की।


और कोई ख़ास बात जो याद हो...
उन्होंने कभी ऐसा नहीं सोचा कि कोई यंग है या बुजुर्ग है..कभी उनमें ऐसी भावना नहीं थी। और वो मराठी बड़ा अच्छा बोलते थे। मुझे लगता है ये उनका इंदौर का प्रभाव रहा होगा कि वो हमेशा मुझसे मराठी में बोलते थे। मैं सवाल उनसे हिंदी में पूछता था मेरी हिंदी बेहतर करने के लिए और वो जवाब हमेशा दिया करते थे मराठी में। तो ये दो-तीन बातें मुझे उस समय की याद हैं। फिर लगातार संपर्क रहा उनसे। उनसे सीखने का काफी मौका मिला मुझे। उनमें कभी bitterness (कड़वाहट) नहीं देखी। उनमें हमेशा ये था कि उनका जो एक्सपीरिएंस था, वो हमेशा लोगों से बांटना चाहते थे। पिछले पांच-छह सालों में जो उनको गुस्सा आया होगा, वो मुझे लगता है, पेड न्यूज़ को लेकर।


हां, आपसे भी काफी टकराहटें हुई थीं इसे लेकर?
हां, कि पेड न्यूज़ क्या होना चाहिए। किस तरह का होना चाहिए। पेड न्यूज़ का मतलब क्या है। मेरा हमेशा ये कहना था कि disclosure (खुलासा) होना चाहिए। कि अगर आप कोई ख़बर कर रहे हैं और उस ख़बर के पीछे 'कोई' है तो आपको ज़रूर ये बताना चाहिए। उनको लिए तो पूरी तरह से Advertising (विज्ञापन) ही...

आपके क्या मतभेद रहे?
नहीं, मतभेद नहीं थे। मुझे लगता है कि उन्हें लगा कि कहीं न कहीं जो आज की पत्रकारिता इतनी भटक गई है..उन्हें डर था पेड न्यूज़ की वजह से आज की पत्रकारिता भटक गई है। मेरा ये कहना है कि आज के ज़माने में आप मार्केटिंग से दूर नहीं रह सकते। आप बेशक पेड न्यूज़ करें। मेरा कहना था कि आप लोगों के सामने डिस्क्लोज़र करें। आगर आपकी कोई ख़बर है और उसके पीछे किसी की स्पांसरशिप है तो लोगों को बताइए। आप सीधा रखिए। मैं आज भी वही मेंटेन करता हूं, कि पूरा डिस्कलोज़र होना चाहिए। पेड न्यूज़ तब है, जब आप लोगों से छल करते हो कि किसी के नाम से आप ख़बर छपवा लो और उसकी जानकारी viewer को नहीं दो। वो एक ऐसे ज़माने के पत्रकार थे जिसमें उनको मार्केंटिग और एडवर्टाइज़िंग (विज्ञापन) से कोई लेना-देना ही नहीं था।

मतलब, बाज़ार के खिलाफ था एकदम?
राजदीप - हां, उनको लगा एकदम बाज़ारीकरण हो रहा है। कमर्शियलाइज़ेशन हो रहा है। मेरा ये कहना है कि कमर्शियलाइज़ेशन को हम पूरी तरह से नकार नहीं सकते। और इसके कुछ benefits (फायदे) भी हैं। वो ज़माना चला गया कि आप जर्नलिज़्म को उस तरह से देख सकें। दुनिया कमर्शियल हुई है। क्या पत्रकार उससे पूरी तरह से हट सकता है। नहीं। क्या पत्रकार अलग रह सकता है। ज़रूर। पत्रकार अलग इस तरह से रह सकता है कि बाज़ारीकरण जो हो रहा है, उसमें आप मार्केंटिंग और एडिटोरियल में एक फर्क तो ज़रूर रखना पड़ेगा। एक चाइनीज़ वॉल रखनी ही पड़ेगी। उनका कहना था कि कोई ज़रूरत नहीं है एडवर्टाइज़िंग की। एडवर्टाइज़िंग से हमें कोई लेना-देना नहीं है। मेरा ये कहना है कि एडवर्टाइज़िंग से आपको कहीं न कहीं एक रिलेशनशिप बनानी पड़ेगी। लेकिन, उस रिलेशनशिप में आपका अपना दायित्व, अपना कर्तव्य viwer या पाठक के पास है, किसी एडवर्टाइज़र के पास नहीं है। तो आपके पास कोई ख़बर है तो वो ख़बर रहती है, आप कोई पीआर नहीं कर रहे। इसमें और उनमें कोई मतभेद नहीं है। उनका इतना ही कहना था कि ये जो भी हो रहा है वो बाज़ारीकरण है। और मैं समझता हूं कि हर चीज़ को अगर हम बाज़ारीकरण के रूप में लें तो वो ग़लत होगा।

वो मीडिया के कारपोरेटाइज़ेशन के सख्त खिलाफ थे।
हां, मगर मेरा ये कहना है कि आप कारपोरेटाइज़ेशन को अगर रावण की तरह देखा करोगे, हर चीज़ जो कॉरपोरेट इंडिया करता है, वो ग़लत है तो ये भी कहना ग़लत होगा, मुझे लगता है। हां, उसके कई निगेटिव पहलू भी आए हैं। पेड न्यूज़ उनमें से एक है। पेड न्यूज़ के खिलाफ हम भी हैं, वो भी थे। मुझे लगता है पेड न्यूज़ किसी भी हालत में हमें मंज़ूर नहीं है। मगर पेड न्यूज़ की परिभाषा क्या है। पेड न्यूज़ मेरे ख़याल में वो है जबकि आप न्यूज़ छपवाते हैं किसी के इशारे पर और वो अपने पाठक या दर्शक को बताते नहीं हैं। उनकी परिभाषा में कोई भी ख़बर जिसमें एडवर्टाइज़र किसी भी तरह से शामिल हो या कोई प्रोग्राम स्पांसर्ड (प्रायोजित) हो, वो सब....

लेकिन, वो जिस हद तक ख़िलाफ थे पेड न्यूज़ के, वो पूरी आज़ादी से स्टैंड ले सकते थे, लेते रहे। आप उस आज़ादी से खिलाफ नहीं हो सकते। आप पर कहीं न कहीं से 'प्रेशर' (दबाव) रहेगा।
मुझे नहीं लगता। मैं तो दूसरी तरफ से देखता हूं। आपका प्रेशर तब कम होता है जब आप कमर्शियली स्ट्रांग (आर्थिक स्थिति मज़ूबत) हैं। आज ख़ास कर के रीजनल मीडिया में क्या हुआ है। रीजनल मीडिया में पेड न्यूज़ ज़्यादा क्यों बढ़ गया है। क्योंकि रीजनल मीडिया एक तरह से फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट (आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर) नहीं है। जब तक आप इंडिपेंडेंट (आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर) नहीं है, तब तक आपको डर हमेशा रहेगा कि एडवर्टाइज़र जो है, वो डिक्टेट करेगा। आप कॉरपोरेटाइज़ेशन को ग़लत देखोगे तो मुझे लगता है कहीं न कहीं हम मिसटेक कर रहे हैं। मैं इस बात की...ये जो ख़बरें चलती हैं कभी-कभी टीवी पर, क्या ये कॉरपोरेटाइज़ेशन की वजह से हैं। कि शाहरुख को कहीं मोच आई या आप बिहार के फ्लड्स(बाढ़) की ख़बर नहीं करेंगे, कोई प्रेम कहानी करेंगे। तो मेरा उनसे उतना ही कहना था कि ये जो डिक्लाइन (पतन) हुई थी, और हमारे मीडिया में डिक्लाइन हुई है। एडिटोरियल पेज पर डिक्लाइन हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार में जो एडिटोरियल एक समय मज़बूत था, अब कमज़ोर हुआ है। उसकी वजह कॉरपोरेटाइज़ेशन नहीं है। उसकी वजह है कि हमारी जो रीढ़ है, हमारी जो बैकबोन है, वो कमज़ोर हुई है। हम ख़ुद कमज़ोर हुए हैँ। हम एक तरह से कॉरपोरेटाइज़ेशन का एक्सक्यूज़ (बहाना) दे रहे हैं कि सब कुछ (ग़लत) कॉरपोरेटाइज़ेशन की वजह से ही हो रहा है। तो वहां, उनमें और मुझमें थो़ड़ा फर्क था। उनका कहना था कि कॉरपोरेटाइज़ेशन को किसी भी हालत में आने नहीं देना चाहिए। मेरा ये कहना है कि कॉरपोरेटाइज़ेशन को आप अकेले ज़िम्मेदार मत ठहराइए। मीडिया में जो डिक्लाइन हो रहा है, उसके लिए हम उतने ही ज़िम्मेदार हैं, जितने कॉरपोरेट्स।

उस दौर की संपादकीय टीम में और आपके दौर की एडिटोरियल टीम में कैसा फर्क आया है। ख़बरों के चयन को लेकर जो बदलाव आए हैं, वो क्या यहीं से नहीं शुरू होते।
देखिए, एक तो मुझे लगता है कि ज़माना बदल गया है। आज मार्केट कांपटीशन बहुत है। कॉरपोरेटाइज़ेशन नहीं मार्केट कांपटीशन। टीवी चैनल जो हैं। अब आप 20-30-40 चैनल लाएंगे, हर चैनल अगर ब्रेकिंग न्यूज़ कर रहा है तो कहीं न कहीं आपका जो दिमाग है, वो ब्रेकिंग न्यूज़ की दुनिया में चला जाता है। वो ख़बरों से दूर हटकर नहीं देखता कि बड़ी तस्वीर क्या है। आप सिर्फ उस समय को भुनाने के चक्कर में चले जाते हैं। और छोटी ख़बर को बड़ी ख़बर करना कैसे है। क्योंकि दर्शक तो एक है। चैनल 25-30 हैं। तो उसको कैसे अपनी तरफ खींचें। और दर्शक का अटेंशन स्पैन (रुके रहने का सब्र) जो है, वो भी कम हुआ है। उसके पास दो घंटे नहीं हैं। जैसे एक ज़माने में पांच दिनों के टेस्ट मैच हुआ करते थे, आज टी-20 है। उसी तरह टीवी में भी हुआ है। एक ज़माने में आप एक घंटे की डॉक्यूमेंट्री करते थे, आज लोग चाहते हैं कि उनको सौ ख़बर दे दो एक मिनट में।


लेकिन, अख़बार क्यों टीवी बनता जा रहा है?
क्योंकि, अख़बार एक तरह से उस टीवी के प्रेशर में आकर, कि यही मेरा भी जो पाठक है, वो मेरे साथ एक घंटा नहीं गुज़ारेगा, उसके पास सिर्फ दस मिनट का समय है। तो आप जो ख़बर हज़ार शब्दों में देते थे 10-15 साल पहले, वही आप उसको सौ अक्षरों में दे दो। कहीं न कहीं टीवी का दबाव तो है। पर, मैं फिर कह रहा हूं कि इसके लिए ज़िम्मेदार हम हैं। हम इससे दूर हट सकते हैं। मैं अभी भी समझता हूं कि इतने बड़े देश में ऐसे भी दर्शक या पाठक होंगे जो चाहते हैं कि आप उनको अच्छी ख़बरें दें। आप उनको ख़बरें सोच-समझ कर दें।

लेकिन, यहां फिर वहीं लोग टीआरपी का रोना रोने लगते हैं।
देखिए, जर्नलिज़्म बॉक्स ऑफिस नहीं है। हमें ये बात अच्छी तरह से समझनी होगी। ये बॉक्स ऑफिस नहीं है कि हम हफ्ते के हफ्ते अपनी कलेक्शन देखें। और मैं समझता हूं कि यही एडवर्टाइज़र भी चाहेगा। कोई भी एडवर्टाइज़र किसी चड्डी-बनियान चैनल के साथ जुड़ना नहीं चाहेगा। एडवर्टाइज़र भी चाहता है कि सबसे बड़ी चीज़ हो उस चैनल या अख़बार की विश्वसनीयता। और विश्वसनीयता कोई एक हफ्ते में नहीं बढ़ती। विश्वसनीयता पाने के लिए आपको दिन पर दिन, साल भर साल लगे रहना होगा। हर दिन लोगों को दिखाना पड़ेगा कि किस तरह की ख़बर होती है। असम में बाढ़ आई तो इसका मतलब नहीं कि आप उसको फर्स्ट हेडलाइन (पहली ख़बर) नहीं बनाएंगे। दिल्ली में सात लोग मरते हैं आग में, आप उसको टॉप हेडलाइन बनाते हैं। असम में सौ लोग मरते हैं बाढ़ में, आप उस पर ध्यान नहीं देते। मेरा आपसे कहना है कि किसने आपको कहा कि असम की हेडलाइन मत बनाओ पहले। दर्शक तो नहीं कह रहा है। आप सोच रहे हैं कि दर्शक सिर्फ दिल्ली की ख़बर देखना चाह रहा है। मैं हमेशा ये कोशिश करता हूं कि इस तरह का 'daring' (चुनौतीपूर्ण) कदम लिया जाए। हमने कल अपनी पहली हेडलाइन असम बनाई थी। आज हमने बिजली के संकट को पहली हेडलाइन रखी है। कौन कहता है कि आप न बनाएँ। ताक़त तो आपके पास है। हां, ये हो सकता है कि कोई कहे, यार ये ख़बर सेक्सी नहीं है, चलेगी नहीं। पर अगर हम इस तरह से सोचें तो बेहतर है पिक्चर बनाएँ फिर। हम फिल्म बनाएं राउडी राठौर जैसी। हमें फिल्म बनानी है या हकी़कत दिखानी है, ये तय करना होगा।

यानी बाज़ार भी है, आपसी रेस भी है, और क्या संकट हैं पत्रकारिता के?
संकट तो हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ इतना आसान है। कल अगर टीआरपी गिरी तो मार्केटिंग वाला एडिटर पर दबाव ज़रूर डालेगा, ये बात सही है। लेकिन कहीं न कहीं हमें उस मार्केंटिग वाले को भी सिखाना पड़ेगा कि आपके लिए भी, आपका जो स्पांसर है, वो विश्वसनीयता देखकर ही आपके पास आएगा।

तो इतने 'डेयरिंग' (साहसी) संपादक अब हैं कहां?
वही तो मुसीबत है ना। हुआ क्या है कि जो मैनेजमेंट है, उसने संपादक का जो रोल है, उसे ख़त्म कर दिया है। हमारी सेल्फ रिस्पेक्ट...। प्रभाष जोशी जो थे, एक ऐसे संपादक थे, जिनके पीछे गोयनका (रामनाथ गोयनका) भी थे, और उनसे मार्केटिंग वाले मिलने से डरते थे, कि प्रभाष जोशी जी हैं। एक 'वेट' (क़द) था। आज भी किसी संपादक के पास 'वेट' हो तो मार्केटिंग वाला दो बार सोचेगा उससे टकराव करने की। पर चूंकि मैनेजमेंट और मार्केंटिंग वालों ने ऐसे संपादकों या पत्रकारों को ख़त्म करने की कोशिश की है,जिस वजह से इतनी समस्या आई है। पर अगर संपादक 'टफ' हुआ तो..

तो प्रभाष जी भी कहीं न कहीं उसी चीज़ से डर रहे थे कि संपादक के व्यक्तित्व को ये कॉरपोरेट ख़त्म कर देंगे?
हां, लेकिन हम अपने आप पर ज़िम्मेदारी लें। जैसे इमरजेंसी के दौरान कुछ एडिटर्स ने उसका सामना किया, कुछ झुक गए। उसी तरह से कारपोरेटाइज़ेशन के साथ उसका सामना करें। मैं समझौता नहीं करुंगा पर उनके साथ बराबर का एक 'इक्वेशन' (समीकरण) बनाकर खड़ा रहूंगा। मगर कुछ लोग बिल्कुल झुक जाते हैं।

कुलदीप नैय्यर जी से बात हो रही थी तो उन्होंने बताया था कि कैसे इमरजेंसी के दौरान करीब 150 पत्रकार एकजुट हुए थे, मगर इंदिरा शासन के खिलाफ साइन करने की बात आई तो केवल 37 लोगों ने किया। इसका मतलब पत्रकार पहले भी डरते थे और अब भी डरते हैं।
डर है, जायज़ भी है। लेकिन पत्रकार की एक विशेषता यही होती है कि वो अपना वज़न बनाए रखता है। हमारा वज़न सोसाइटी से आता है। हमारा वज़न न तो सैलरी से आता है और न कहीं और से। हमारा वज़न सिर्फ हमारी राइटिंग (लेखन), हमारी पत्रकारिता से आता है। वो एक तरह से यूनीक है। और एक पास आपके पास वज़न हो, तो फिर कोई भी मार्केटिंग वाला भी आपके पास आएगा। क्योंकि आपमें जो विश्वसनीयता है, वो किसी और में नहीं है। स्पांसर एक तरह से आपकी विश्वसनीयता ख़रीदना चाहता है।

संकट तो और भी कई हैं। जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया में कई लोगों के शेयर लगे हुए हैं। तो कम से कम जिन कंपनियों के शेयर लगे हुए हैं, उनके ख़िलाफ तो वहां ख़बरे जाएंगी नहीं।
वही तो पेड न्यूज़ की समस्या है। कि कारपारेट आपको शेयर दे दे और उसके शेयर के बदले में आप उसके बारे में अच्छा लिखें तो कैसे चलेगा। क्योंकि आप अपने पाठक या दर्शक को तो नहीं बता रहे हैं कि यहां इनका शेयर है। मैं कहता हूं आप बताइए कि मेरा शेयर है और फिर स्टोरी करिए। वरना आप सबको धोखा दे रहे हैं। पर मैं ये नहीं मानता कि स्ट्रांग एडिटर्स (मज़बूत संपादकों) के लिए जगह नहीं है। रास्ता ज़रूर है। हां, एक फर्क ये है कि प्रभाष जोशी जी के ज़माने में जर्नलिस्ट (पत्रकारों) के लिए रिस्पेक्ट (सम्मान) था। आज रिस्पेक्ट चला गया है। 'फियर' (डर) है। लोग हमसे डरते हैं। लेकिन, हमें रिस्पेक्ट नहीं करते। ये फर्क है। उस समय लोग पत्रकारों से डरते नहीं थे।

उस समय पत्रकारों में एक तरह से 'एक्टिविज़्म' भी था। प्रभाष जी ख़ुद भी घूम-घूम कर पत्रकारिता किया करते थे। पहले समाज से बहुत जुड़े हुए थे पत्रकार, अब तो गूगल से ही काम चल जाता है?
देखिए, एक्टिविज़्म का क्या है मतलब। कुछ लोग कहेंगे कि उस ज़माने में जो एक्टिविज़्म थी, वो एक तरह से पार्टिज़न (पक्षपाती) भी थी। कुछ लोग ये भी कहेंगे कि आप कैंपेन हमारे खिलाफ चला रहे थे। जैसे प्रभाष जी एक्टिविज़्म करते थे, दूसरे कुछ और भी कहते।

आप लोगों ने भी तो गुजरात में एक स्टैंड लिया था?
देखिए, आप एक्टिविज़्म कब कर सकते हैं। जब आपको बिल्कुल आपमें विश्वास हो कि जो हो रहा है, वो एकदम ग़लत है। वो लोगों के सामने आप दिखाएं। मेरा ये कहना है कि अब कांग्रेस ग़लत करती है, आप कांग्रेस के खिलाफ एक्टिविज़्म करें। जब बीजेपी ग़लत करती है, आप बीजेपी के खिलाफ एक्टिविज़्म करें। अब ये एक्टिविज़्म है या जर्नलिज़्म है। मेरे ख़याल में जर्नलिज़्म है। मैं अपने आप को एक्टिविस्ट नहीं मानता। एक्टिविस्ट जो होगा, वो अक्सर दूसरे (पक्ष) की बात सुनने से हिचकिचाएगा। क्योंकि उसको लगता है कि दूसरा जो है, वो ग़लत ही है। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जर्नलिस्ट जब एक्टिविस्ट बनने लगते हैं तो हम हमारी निष्पक्षता भूल जाते हैं। मैं एक्टिविज़्म में विश्वास नहीं करता। मैं समझता हूं आपके जर्नलिज़्म में इतना दम होना चाहिए कि वो अपने आप एक्टिविज़्म जैसा हो जाए। मैं नहीं समझता कि मैंने जो गुजरात में किया वो एक्टिविज़्म था। तीस्ता सीतलवाड एक्टिविस्ट हैं। इसीलिए अगर मैं आज कहूं कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात में कृषि के लिए अच्छा काम किया है, तो तीस्ता नहीं मानेंगी क्योंकि उनकी एक्टिविज़्म के मुताबिक नरेंद्र मोदी 'विलेन' हैं। मैं पत्रकार हूं। मैंने उनको कहा भी कुछ दिन पहले, जब ये SIT की रिपोर्ट आई और मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे, उन्होंने मुझे कहा कि आप क्या कर रहे हैं। आप तो नरेंद्र मोदी के साथ अब हो गए हैँ। मैंने कहा कि साथ का सवाल नहीं है। अगर रिपोर्ट आई है, रिपोर्ट में कुछ सवाल उठे, तो पत्रकार का दायित्व है कि वो सवाल उठाए। दरअसल, जो Tolerance (सहनशीलता) थी, वो अब नहीं है। वो बहुत ही कम हुआ है। और हमारे पत्रकार भी politicized हो गए हैं। और एक्टिविस्ट भी हो गए हैं। इसकी वजह से हम कैंप्स (गुटों) में बंट गए हैं। नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाला कैंप या उसके पक्ष में। मैं कहता हूं जो अच्छी बातें हैं हम कहेंगे, जो बुरी बातें हैं वो भी कहेंगे। लेकिन जब हम अच्छी बातें कहते हैं आप कहेंगे हम बिक गए हैं।

चलिए, मोदी से हटकर बात करते हैं। आपके बारे में एक सीनियर जर्नलिस्ट कह रहे थे कि आप कई जगहों पर अंबानी के साथ खड़े दिखते हैं, उनके फैमिली फंक्शन में भी रहते हैं। तो ऐसे में आपकी पत्रकारिता या 'एक्टिविज़्म' वहां कमज़ोर नहीं पड़ जाती है? 
नहीं, नहीं। देखिए, मैं पत्रकार हूं। अगर मैं अंबानी के साथ खड़ा रहूं फंक्शन में और उसके बाद अगर कोई स्टोरी आए अंबानी की और मैं उस स्टोरी को दबा दूं तो आप मुझे कह सकते हैं। देखिए, पत्रकार जो है कई लोगों से मिलेगा। उनके कई रिलेशनशिप्स (संबंध) होंगे। लेकिन, आखिर में आप अपने चैनल पर क्या चलाते हैं या एडिटोरियल में क्या लिखते हैं, उससे फर्क पड़ता है। अब मैंने एक आर्टिकल लिखा तीन दिन पहले नीतीश पर। नीतीश जी और मोदी की तुलना करते हुए। अब नीतीश जी गुस्सा हैं। वो कह रहे हैं कि आपने मेरी कंपैरिज़न (तुलना) मोदी के साथ कर दी। अब कल तक वही नीतीश जी मुझे कह रहे थे कि आप बड़े धर्मनिरपेक्ष जर्नलिस्ट हैं। मेरी यही तो मुसीबत है। अगर सबको मुझसे दिकक्त है और सब मुझ पर आक्षेप लगाते रहें तो ये ठीक ही है। मुझे न नरेंद्र मोदी से लेना-देना है, न नीतीश कुमार से। तो प्रॉब्लम यही है कि नेताओं में भी tolerance (सहनशीलता) बहुत घटी है पहले की तुलना में। प्रभाष जोशी भले ही कुछ भी लिखते रहे आडवाणी या वाजपेयी जी के खिलाफ, ख़ास कर वाजपेयी जी पर, इसका मतलब ये नहीं कि वाजपेयी जी और उनके निजी संबंध ख़राब हो गए। या वाजपेयी जी ने उनकी स्टोरीज़ को दबाने की कोशिश की या कहा हो कि प्रभाष जोशी आप बिक गए हैं। लेकिन अगर मैं आज उसी तरह की पत्रकारिता करने की कोशिश करूं तो लोग कहेंगे कि आप बिक गए हैँ। तो सोच का फर्क है। ज़माना बदल गया है। प्रभाष जोशी का जो ज़माना था, वो एक तरह से बदल गया है।

प्रभाष जोशी का ज़माना ख़त्म हो गया है या बदल गया है?
नहीं. बदल गया है। ख़त्म भी कह सकते हैं। देखिए, अब दर्शक बदल गये हैं, नेता बदल गए हैं, संपादक बदल गए हैं, बाज़ार बदल गया है।

अब उस दौर की कोई ज़रूरत है क्या ?
देखिए, इंटेग्रिटी (इमानदारी) की ज़रूरत तब भी थी, आज भी है। Integrity के लिए अभी भी स्पेस है। अपनी पर्सनल इंटेग्रिटी के लिए जो जगह 20-30 साल पहले थी, वो आज भी है। आज थोड़ा मुश्किल है। हमारे सामने चुनौतियां और हैं। क्योंकि स्थितियां और भी जटिल हो गई हैं। प्रॉफिट का प्रेशर होता है। बाज़ार का प्रेशर होता है। ये सब चुनौतियां हैं। पर इसके बावजूद ये कहना कि क्या उनकी ज़रूरत नहीं है, बिल्कुल है। मैं समझता हूं आज ज़रूरत ज़्यादा है। क्योंकि इस प्रोफेशन को अगर हम पटरी पर लाना चाहें तो ये तभी ला सकते हैं जब जो आइडियलिज़्म (आदर्श), जो सोच प्रभाष जोशी जी में था, वो वापस लाएं। तो राह से हम भटक गए हैं ये बात सही है लेकिन अगर वापस पटरी पर आना है तो उस तरह की पत्रकारिता एक बार फिर करनी पड़ेगी। भले ही जो भी दबाव या चुनौतियां हों।

आइडियलिज़्म के लिहाज से पूछूं तो अभी हाल ही में जो एकाध आंदोलन देश में होते दिखे, उसमें संपादक कितने एक्टिव या इनएक्टिव दिखे?
देखिए, अन्ना के आंदोलन की बात कर रहे हैं तो मेरा तो एक तरह से क्रिटिसिज़्म (आलोचना) है उस पर। हम (कई संपादक) अन्ना के चीयरलीडर बन गए। तो मैं कहना चाह रहा हूं कि एक्टिविस्ट की भूमिका में जर्नलिस्ट आ जाए तो डेंजरस (ख़तरनाक) है। क्योंकि जब आप एक्टिविस्ट बन जाते हैं तो उस मूवमेंट की जो कमियां हैं, वो लोगों के सामने नहीं लाते। या तो आपको दिखाई देती हैं और आप लाते नहीं हैं या आप देखना नहीं चाहते। हमने देखा कि कैसे कुछ संपादक अन्ना के मूवमेंट में चीयरलीडर बन गए थे और मुझे वो अच्छा नहीं लगा। अच्छा, मेरे साथ प्रॉब्लम ये हो गई कि मैंने क्रिटिसाइज़ किया तो लोग कहने लगे कि अरे, आप करप्ट के साथ जुड़ गए हैं। अब मैंने अगर जनलोकपाल बिल पर कुछ प्रश्न उठाए तो इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं करप्ट हूं। दरअसल, हम ये फर्क नहीं सोच पाते एक पत्रकार और एक्टिविस्ट का। मैं चीयरलीडर नहीं हूं। मैं टीम अन्ना का सदस्य नहीं हूं। मुझे नहीं होना है। अगर होना होता तो मैं शामिल हो जाता फिर। हां, जब आप संपादकीय लिखें तो उसमें ज़रूर लिख सकते हैं कि अन्ना जो कर रहे हैं वो सही है पर हर रोज़, ये दिक्कत है।

अच्छा, ये तो बता दीजिए कि प्रभाष जोशी और सचिन के बीच क्या जादुई रिश्ता था।
वो सचिन के बहुत शौकीन थे। उनकी हमेशा सचिन से मिलने की बहुत ख़्वाहिश थी। और देखना भी चाहते थे सचिन को। मुझे जहां तक याद है 1992 में हमलोग वर्ल्डकप के लिए साथ में ऑस्ट्रेलिया गए थे। और वहां हम सचिन से मिले थे। वो बहुत खुश हुए थे। मैं टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए लिख रहा था और वो जनसत्ता के लिए। सचिन को देखना उनके लिए एक तरह से मोक्ष ही था।