बुधवार, 29 जून 2011

चांद एक शहर और खरीदा हुआ पानी...

वो बहुत दुखी था....कहने लगा, पूरी जवानी खराब कर दी...ये नहीं पता था कि क्या करना है, लेकिन फिर भी बड़ा आदमी बनने का मन था। ट्यूशन के वक्त मैंने लाइन नहीं मारा..कितना सैक्रीफाइस किया है...मेरा भी मन था कि फिल्म देखें, गोवा घूमे...वगैरह वगैरह...। मुझे इतना सुनकर हंसी आ गई। लेकिन उसका कहना जारी रहा - क्या बताएं आपको। मेरे बाप ने मुझे समझा ही नहीं। पढ़ाते थे फटीचर स्कूल में और सोचते थे कि शहर वाले भाईयों से टक्कर ले लूंगा। एक बार शहर वाले भाई छुट्टियों में गांव आए तो उनके सामने बड़ा ज़लील किया मुझे। एबीसीडी नहीं आती थी तो शहरी स्कूल वाले भाई से पिटवाते थे पापा...ज़िंदगी भर नहीं भूला..। मुझे उस पर तरस आने के बजाय हंसी आती रही।


उसकी आमदनी इतनी थी कि वो ज़िंदगी भर रोज़ ब्लैक में टिकट ख़रीदकर एक ऊबाऊ फिल्म देख सकता था या फिर किसी बूढ़े मजबूर आदमी की कहानी सुनकर उसे रोज़ प्यार से महंगे फल खिला सकता था, मगर फिर भी रिक्शेवाले से पांच रुपये के लिए झगड़ना उसकी आदतन मजबूरी थी। शायद इसे ही सामाजिक भाषा में संस्कार कहते हैं जिनसे पीछा छुड़ाने के लिए मज़बूत दिल का होना ज़रूरी है।

उसे आज़ादी इतनी पसंद थी कि वो रोज़ सपने में अपना ही घर जला दिया करता और फिर भी उसे अफसोस नहीं होता। चूंकि उसे बच्चे बहुत प्यारे थे इसीलिए तो सपने में कितनी भी भीड़ होती, एक बच्चा उसकी उंगली पकड़कर ज़रूर चल रहा होता। वो उस बच्चे के साथ नदी के पानी पर चलता हुआ चांद के किस्से सुनाना पसंद करता था। बच्चे को लगता कि चांद एक शहर जैसा है जहां एक दिन वो नौकरी करने ज़रूर जाएगा और खरीद कर पानी पियेगा।

उसे उधार देकर भूल जाने की आदत थी इसीलिए उसके दोस्तों की तादाद उसके दुश्मनों से क़हीं ज़्यादा थी। इधर कुछ लोग मेरे साथी कहे जाते थे। वो क्रांतिकारी और प्रगतिशील कहलाना पसंद करते थे। वो मेरे पैसे कमाने का इंतज़ार कर रहे था ताकि उनकी क्रांति का खर्च निकल सके। चूंकि क्रांति इस देश के संस्कारों में रही है, इसीलिए इसके मौजूदा स्वरूप पर बहस फालतू ही कही जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे अगर आप इस पर बहस करें कि प्रेम विवाह और जुगाड़ (अरेंज) विवाह में बेहतर कौन है।

मेरा तो अब तक ये मानना है कि इस बहस से ज़्यादा फालतू प्रेम और विवाह ही हैं। जिस देश में घोटाले न होते हों, वहां शोध कराकर देख लें, ये बात सौ फीसदी सच निकलेगी कि भारत देश की अर्थव्यवस्था का सबसे ज़्यादा नुकसान प्यार और शादियों ने ही किया है। फिर भी हम हैं कि इसे समाज का आखिरी सच मानकर प्यार और शादियां किए जाते हैं।

हालांकि, संस्कारों के दायरे में ये बात सच मान लेने में ही भलाई है कि प्रेमिकाएं अगर जवानी का सहारा होती हैं, तो बुढ़ापे का सहारा पत्नी। संस्कार ये भी है कि हम घुटकर मर जाएं मगर शादी ज़रूर करें।

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 27 जून 2011

रो चुके बहुत...

प्यार हमें कहीं भी हो सकता है...

उन लड़कियों से भी जिनसे कभी मिले नहीं...

और मिलना संभव भी नहीं...


जहां हम नहाते हैं,

उसकी दीवारों पर एक बिंदी देखती है लाल रंग की...

शर्म से लाल है शायद...

बताइए क्या प्यार करने को इतनी वजह काफी नहीं...


क्या हंसना सिर्फ इसीलिए नहीं होता

कि रो चुके होते हैं हम बहुत....

बहुत रो चुके होते हैं हम....

और भूल जाते हैं अगली बार रोना।


कभी-कभी अकेले में

हम सबसे बुरे होते हैं...

और तब मरने के लिए इतनी वजह काफी होती है कि

जीने का तरीका ही नहीं आया

कभी-कभी मरना शौक की तरह ज़रूरी लगता है...

कोई डांटे इस बुरी लत पर

और हम आधा छोड़कर मरना, जी उठें...


और सुनिए, यहां गोली मार देने के लिए

ये ज़रूरी नहीं कि आपका झगड़ा हो...

इतनी वजह काफी है कि

आपके पास बंदूक है...
 
निखिल आनंद गिरि
 
(इस कविता को हिंदी मैगज़ीन पाखी के जून अंक में भी जगह मिली है)

रविवार, 19 जून 2011

पापा के नाम...

मुझे याद है,

जब मेरी ठुड्डी पर थोडी-सी क्रीम लगाकर,

तुम दुलारते थे मुझे,

एक उम्मीद भी रहती होगी तुम्हारे अन्दर,

कि कब हम बड़े हों,

और दुलार सकें तुम्हे,


आज भी ठीक से नहीं बन पता शेव,

ठुड्डी पर उग आई है दाढी,

उग आए हैं तुम्हारे रोपे गए पौधे भी,

(भइया और मैं...)

मैं बड़ा होता रहा तुम्हे देखकर,

तुम्हारी उम्र हमेशा वही रही...


तुमने कभी नहीं माँगा,

मेरे किए गए खर्च का हिसाब,

एक विश्वास की लकीर हमने,

खींच-ली मन ही मन,

कि,

जब कभी कोई नहीं होता मेरे साथ,

मेरे आस-पास,

तुम दूर से ही देते हो हौसला,

साठ की उम्र में भी तुम,

बन जाते हो मेरे युवा साथी,

पता नहीं मैं पहुँच पाता हूँ कि नहीं,

तुम तक,

जब सो जाती है माँ,

और तुम उनींदे-से,

बतिया रहे होते हो अपनी थक चुकी पीठ-से,

काश, मैं दबा पाता तुम्हारे पाँव हर रोज़!!



अक्सर मन होता है कि,

पकड़ लूँ दिन की आखिरी ट्रेन

और अगली सुबह हम खा सकें,

एक ही थाली में...



तुम कभी शहर आना तो

दिखलाऊं तुम्हे,

कैसे सहेज रहे हैं हम तुम्हारी उम्मीदें,

धुएं में लिपटा शहर किसे अच्छा लगता है...


मैं सोचता हूँ,

कि मेरा डॉक्टर या इंजीनियर बनना,

तुम्हे कैसे सुख देगा,

जबकि हर कोई चाहता है कि,

कम हो मेरी उपलब्धियों की फेहरिस्त.....

मैं सोचता हूँ,

हम क्या रेस-कोर्स के घोडे हैं,

(भइया और मैं...)

कि तुम लगाते हो हम पर,

अपना सब कुछ दांव..


तुम्हारी आँखें देखती हैं सपना,

एक चक्रवर्ती सम्राट बनने का,

तुमने छोड़ दिए हैं अपने प्रतीक-चिन्ह,

(भइया और मैं....)

कि हम क्षितिज तक पहुँच सकें,

और तुम्हारी छाती चौड़ी हो जाए

क्षितिज जितनी..


रोज़ सोचता हूँ,

भेजूँगा एक ख़त तुम्हे,

मेरी मेहनत की बूँद से चिपकाकर,

और जब तुम खोलो,

तुम्हारे लिए हों ढेर सारे इन्द्रधनुष,

कि तुम मोहल्ले भर में कर सको चर्चा...

और माँ भी बिना ख़त पढे,

तुम्हारी मुस्कान की हर परत में,

पढ़ती रहे अक्षर-अक्षर....

निखिल आनंद गिरि

रविवार, 12 जून 2011

पेशाब के बहाने...

कुछ किताबों के पहले पन्ने पर जंतर लिखकर
हमें वश में करने की साज़िश थी...

गणित उतना जितना हिसाब के काम आ सके,
कि कितने मरे, कितने बाक़ी हैं मर जाने को..

समाजशास्त्र जिसमें लिखी होती थी,
लड़की की शादी की सही उम्र...
और ये नहीं कि जब चूमने का मन करे तो,
मौलिक अधिकार के बदले मजबूर पिता क्यों याद आते हैं...

भूगोल में कभी नहीं दिखा तुरपाई करती मां का चेहरा...
जहां कहते हैं बसती है सारी दुनिया....
तो फिर वो क्या था जो किताबों में दर्ज था..
मां की जगह....
जंतर ही होगा....

अंग्रेज़ी इतनी कि बस पूछिए मत...
चलिए बता देते हैं....
इतनी कि कूंकूं करते...
जब बोलें बड़े सलीके से,
मगरूर हाकिमों के सामने...
तो लगे कि इंसान की योनि में भटक कर आ गए,
हमें तो दुम वाला एक जानवर होना था...

और क्या बताएं उस दोगले समय के बारे में...
जब लिखावट के नंबर मिला करते थे...
और हमें कंप्यूटर भी सिखाया गया..
जहां सब लिखावटें एक-सी बोरिंग....
सब निर्देश एक जैसे उबाऊ...

इतिहास भी आधा-अधूरा मिला पढ़ने को...
सनकी राजाओं का ज़िक्र ही तो इतिहास नहीं.....
ख़त्ताती के उन हाथों का क्या,
जिन्होंने रचे खूबसूरत इतिहास,
दीवारों पर, मीनारो पर, रौज़ों पर....
और अब कोई नामलेवा तक नहीं...

उस कोचवान इलियास का इतिहास भी तो हो..
जिसकी सात पुश्तों ने किया अदाब..
नवाबों की बेगमों को...
और झुके रहे उनकी खिदमत में....
और बेटों को पुश्तैनी शौक के बजाय सिखाया हुनर,
मेकैनिक का, मिस्त्री का...
कि पैसा ज़रूरी है शौक से ज़्यादा...

जिन बेंचों पर टिका के बैठे रहे बचपन...
उनका इतिहास कहां मिलेगा...
कि टूटीं, कि बेच दी गईं....
और उस रोशनदान का,
जहां से दिखती थी बाहर की दुनिया...
और हम तब तक निहारते...
जब तक पेशाब के बहाने उचक कर खड़ा हुआ जा सकता है....

(हिंदी पत्रिका 'पाखी' के जून अंक में प्रकाशित)
निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 4 जून 2011

तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगता है...

दो साल पहले लिखी गई एक नज़्म शेयर करने का मन कर रहा है...

तुम कैसे हो?


दिल्ली में ठंड कैसी है?

....?

ये सवाल तुम डेली रूटीन की तरह करती हो,

मेरा मन होता है कह दूं-

कोई अखबार पढ लो..

शहर का मौसम वहां छपता है

और राशिफल भी....



मुझे तुम पर हंसी आती है,

खुद पर भी..

पहले किस पर हंसू,

मैं रोज़ ये पूछना चाहता हूं

मगर तुम्हारी बातें सुनकर जीभ फिसल जाती है,

इतनी चिकनाई क्यूं है तुम्हारी बातों में...

रिश्तों पर परत जमने लगी है..

अब मुझे ये रिश्ता निगला नहीं जाता...

मुझे उबकाई आ रही है...

मेरा माथा सहला दो ना,

शायद आराम हो जाये...



कुछ भी हो,

मैं इस रिश्ते को प्रेम नहीं कह सकता...

अब नहीं लिखी जातीं बेतुकी मगर सच्ची कविताएं...

तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगने लगा है,

या किसी पेपरवेट-सा....

भरम में जीना अलग मज़ा है...



मेरे कागज़ों से शब्द उड़ न जाएं,

चाहता हूं कि दबी रहें पेपरवेट से कविताएं....

उफ्फ! तुम्हारे बोझ से शब्दों की रीढ़ टेढी होने लगी है....



मैं शब्दों की कलाई छूकर देखता हूं,

कागज़ के माथे को टटोलता हूं,

तपिश बढ-सी गयी लगती है...

तुम्हारी यादों की ठंडी पट्टी

कई बार कागज़ को देनी पड़ी है....



अब जाके लगता है इक नज़्म आखिर,

कच्ची-सी करवट बदलने लगी है...

नींद में डूबी नज्म बहुत भोली लगती है....

जी करता है नींद से नज़्म कभी ना जागे,

होश भरी नज़्मों के मतलब,

अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

 
निखिल आनंद गिरि