बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

मुझे ये शहर तो ख़्वाबों का कब्रिस्तान लगता है..

जो पत्थर की तरह बस बेहिस-ओ-बेजान लगता है
वही चेहरा मुझे अक्सर मेरा भगवान लगता है..

हमारे गांव यादों में यहां हर रोज़ मरते हैं,
मुझे ये शहर तो ख़्वाबों का कब्रिस्तान लगता है..

ज़रा फुर्सत मिले तो देखिए उसको अकेले में,
वो गोया भीड़ में अच्छा-भला इंसान लगता है..

उजाले ही उजाले हों तो कुछ घर सा नहीं लगता..
अंधेरों के बिना भी घर बहुत वीरान लगता है..

मेरे ख्वाबो की गठरी को समंदर में बहा डालो,
मेरे कमरे में रद्दी का कोई सामान लगता है..

मैं किसको उम्र के इस कारवां में हमसफर समझूं.
मुझे हर शख्स बस दो दिन यहां मेहमान लगता है..

ज़रा मेरी तरह पत्थर पे सजदे करके भी देखे
जिसे भी इश्क नन्हें खेल सा आसान लगता है....

मैं ज़िंदा हूं तुम्हारे बिन, यक़ीं ख़ुद भी नहीं होता,
यहां पहचान साबित ना हो तो चालान लगता है..

निखिल आनंद गिरि

16 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

ज़रा फुर्सत मिले तो देखिए उसको अकेले में,
वो गोया भीड़ में अच्छा-भला इंसान लगता है..

शानदार!

वन्दना ने कहा…

दिल को छूती बहुत ही शानदार गज़ल्।

मनोज कुमार ने कहा…

उजाले ही उजाले हों तो कुछ घर सा नहीं लगता..
अंधेरों के बिना ये घर मुझे वीरान लगता है..
अहा! लगता है आपने मेरे मन की बातें लिख दी हों।

अखिलेन्‍द्र प्रताप यादव ने कहा…

one of the best post on your blog..!! there is no word to say about this post...just..Hats Off..

Prem Chand Sahajwala ने कहा…

निखिल यह एक अति सुंदर गज़ल है और इस का हर शेर दिल को काट डालता है. वैसे एक शेर पढ़ कर मुझे लगा कि लाईट ऑफ कर के लेटे रहने की मेरी आदत अच्छी है.

Nidhi Chandani ने कहा…

बहुत अच्छा निखिल आपने तो वो समझ कर ज़िदगी के बारे में कह दिया जिसे लोग अक्सर समझ ही नहीं पाते ......very nice....waiting for the next one.....all the best ..god bless you......कुछ ऐसी कला आपमें है जो भगवान चुनिंदा लोगों में देते हैं....you are lucky ...और ये कहना ग़लत नहीं होगा कि आप ख्यालों के बादशाह है ....

Patali-The-Village ने कहा…

दिल को छूती बहुत ही शानदार गज़ल्।
विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

Manish ने कहा…

बेहतरीन!!
ज़रा मेरी तरह पत्थर पे सजदे करके भी देखे
जिसे भी इश्क नन्हें खेल सा आसान लगता है..

ये वाली पंक्ति विशेषकर अच्छी लगी!! :)

Kamruddin Khan ने कहा…

निखिल साब सबने इनती तारीफ की है आपकी कि अब मन नहीं करता....लफ्ज़ ही नहीं हैं तारीफ के लिए....बेहद भारी भरकम ग़ज़ल है....अब फिल्मों के लिए लिखना शुरू कीजिये...साहिर,शकील,हसरत,शैलेन्द्र की कमी महसूस हो रही है...

kanu..... ने कहा…

मैं ज़िंदा हूं तुम्हारे बिन, यक़ीं ख़ुद भी नहीं होता,
यहां पहचान साबित ना हो तो चालान लगता है.....sundar

ritu raj ने कहा…

superb

Rashmi savita @ IITR ने कहा…

kya kahoon...nihsabd hoon ....maun hoon....
verryy nice.

दीपक बाबा ने कहा…

मैं ज़िंदा हूं तुम्हारे बिन, यक़ीं ख़ुद भी नहीं होता,
यहां पहचान साबित ना हो तो चालान लगता है..


दिल को छु गई ये पंक्तियाँ .

Shikha ने कहा…

मैं किसको उम्र के इस कारवां में हमसफर समझूं.
मुझे हर शख्स बस दो दिन यहां मेहमान लगता है..

too gud.. kuch jaisa main sochti hun

neelam ने कहा…

मेरे ख्वाबो की गठरी को समंदर में बहा डालो,
मेरे कमरे में रद्दी का कोई सामान लगता है..


i like this one ..............:(

बेनामी ने कहा…

ज़रा मेरी तरह पत्थर पे सजदे करके भी देखे
जिसे भी इश्क नन्हें खेल सा आसान लगता है..


Ishk hai... hota hai ..bas itna yakin kaafi hai..

CHARU