बुधवार, 28 दिसंबर 2011

मैं जी रहा हूं कि मर गया...

जो घड़ी-सी थी दीवार पर
वो कई दिनों से बंद है...
मेरे लम्हे हो गए गुमशुदा
किसी ख़ास वक्त में क़ैद हूं...

हुए दिन अचानक लापता...
यहां कई दिनों से रात है....
मुझे आइने ने कल कहा
तुम्हें क्या हुआ, क्या बात है

मुझे अब भी चेहरा याद है,
जो पत्थरों में बदल गया...
कोई था जो मेरी रुह से,
बिन कहे ही फिसल गया

ये उदासियां, बेचारग़ी
मेरे साथ हैं हर मोड़ पर,
आगे खड़ी हैं रौनकें,
तू ही बता मैं क्या करूं..

मैं रो रहा हूं आजकल
सब फिज़ाएं नम-सी हैं
जीते हैं कि इक रस्म है...
सांसे तो हैं, पर कम-सी हैं...

मैं यक़ीं से कहता हूं तू ही था
जो सामने से गुज़र गया
कोई ये बता दे देखकर,
मैं जी रहा हूं कि मर गया

निखिल आनंद गिरि

रविवार, 18 दिसंबर 2011

याद आता है फिर वही देखो...

उसकी भी क्या है ज़िंदगी देखो
रोज़ करता है खुदकुशी देखो

यूं तो कई आसमान हैं उसके,
खो गई है मगर ज़मीं देखो

यूं भी क्या ख़ाक देखें दुनिया को
जो ज़माना कहे, वही देखो

कल  कोई आबरू लुटी फिर से,
आज ख़बरों में सनसनी देखो

जाते-जाते वो छू गया मुझको
दे गया अनकही खुशी देखो

सबके कहने पे जिये जाता है
कितना बेबस है आदमी देखो

बारहा जिसको भूलना था 'निखिल'
याद आता है फिर वही देखो...

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

अगला स्टेशन 'शादी'पुर है, कृपया सावधान रहें...

दिल्ली मेट्रो में वैशाली स्टेशन से लेकर द्वारका या द्वारका से नोएडा सिटी सेंटर स्टेशन तक का सफर कर लिया तो समझिए मिनी-भारत यात्रा कर ली। पर्यटकों के लिए चार्टर्ड बसों में यही यात्रा ज़्यादा पैसे देकर होती है, मेट्रो में 20-25 रुपये में। वैशाली से जब मेट्रो खुलती है (दिल्ली में ट्रेन 'खुलती' है बोलिए तो लोग समझ जाते हैं कि सामने वाला बिहार से है, यहां ट्रेन चलती है !) तो लगता है बिहार से चली है। झोरा, (झोला) बोरा, पेटी बक्सा, कार्टून सब के साथ पैसेंजर चढ़ता है। ठसाठस। 

चारों तरफ फोन बजता रहता है।

रिंगटोन 1 - चाल चले ली मतवाली बगलवाली....
आवाज़ एकदम तेज़, पूरी बोगी मुड़कर देखने लगती है तो रिंगटोन को साइलेंट पर लेकर नंबर देखा जाता है, फिर बात शुरू....
'हां, पहुंच गेली' ,
'टाइमे से पहुंचा दिया ट्रेन'
'आवाज झरझरा रहा है, पहुंच के फोन करइछी....'
'पहुंच के फोन करते हैं फेरु...'

रिंगटोन 2-  शुरू हो रही है प्रेम कहानी..
फिर शोर की हद तक गाना बजता है। सुबह-सुबह आधी नींद में बैठे यात्री अचानक रिंगटोन को घूरने लगते हैं। रिंगटोन अचानक चुप हो जाती है।

फिर एक 'बिग बॉस' नुमा आवाज़ गूंजती है...
''मेट्रो में अनजान लोगों से दोस्ती न करें.....'

मैं अपने पर्स पर हाथ डालता हूं, देखता हूं वो सही जगह पर ही है। मुझे सुकून होता है। सब एक-दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं, संतुष्ट होते हैं। मेट्रो तुम कितनी अच्छी हो। शिष्टाचार से लेकर अच्छे-बुरे की पहचान का सारा ठेका तुम्हारा है। तुमने हमें दान करना सिखाया है। रक्तदान, जीवनदान, ये दान, वो दान के बाद अब 'सीट' दान। कहीं लिखा नहीं मगर हम जानते हैं..ज़रूरतमंद की सहायता करना हमारा धर्म है। .सीट देकर पुण्य के भागी बनें । बूढ़ी निगाहें युवा आंखों में झांककर कहती हैं 'तुम हमें सीट दो, हम तुम्हें थैंक्यू कहेगे'...ओह मेरी मेट्रो, तुम कितनी अच्छी हो।

मेट्रो से नीचे एक अलग ही दुनिया दिखती है। सड़कों पर कारों का मैराथन जैसा दिखता है। सामने एक सरकारी स्कूल भी है, बच्चे खेल रहे हैं। कल ये बच्चे इन्हीं कारों में आ जाएंगे। फिर इनके बच्चे इन स्कूलों में नहीं जाएंगे। मेट्रो के भीतर भी बच्चे खेल रहे हैं। मेट्रो की डंडी पकड़कर से गोल-गोल घूंम रहे हैं। बच्चों के चेहरे बदल जाते हैं, मगर वो घूमते एक ही तरह से हैं। एक बड़़ी-सी होटलनुमा बिल्डिंग दिखती है। फिर सामने उतना ही बड़ा नाला। नाले में बिल्डिंग ख़ूबसूरत लगती है। मेट्रो चली जाती है। पहला डिब्बा लेडीज़ का है। दूसरा डिब्बा भी लेडीज़ एक्सटेंशन बना हुआ है। कोई विरोध नहीं है। सब मज़े में हैं।

राजीव चौक से द्वारका की तरफ आते-आते मेट्रो का बिहार 'पंजाब' में तब्दील होने लगता है।
अगला स्टेशन शादीपुर है...कृपया सावधानी से उतरें। ये शादीपुर स्टेशन सचमुच डरावना लगता है।यहां कितनी शादियां होती होंगी, सोचता हूं। बड़ा मजबूर, लटका हुआ सा स्टेशन होगा ये शादीपुर। मुझे इस स्टेशन पर नहीं उतरना। मेट्रो, काश तुम असल ज़िंदगी में भी ऐसे ही सावधान कर पातीं।

फिर कीर्तिनगर, मोतीनगर, रमेशनगर। कोई रमेश नाम का आम आदमी यहां रहता होगा, जिसे मेट्रो ने सेलिब्रिटी बना दिया है। फिर जनकपुरी से लेकर सेक्टरमय द्वारका सब एक ही ट्रिप में दर्शन देते हैं। 'वैशाली' से खुलकर ट्रेन 'नवादा' पहुंच गई है। घूम-घूमकर बिहार, पंजाब सब दिखते हैं मेट्रो में, बस दिल्ली नहीं दिखती। ये दिल्ली अभी बहुत दूर है। कहीं खो गई है मेट्रो की भीड़ में। जैसे सौ साल की कोई बुढ़िया मेले में खो जाती होगी। 'बिग बॉस' , तुमने इस बुढ़िया को सावधान नहीं किया था क्या....

निखिल आनंद गिरि

रविवार, 4 दिसंबर 2011

हर शरीफ आदमी को 'डर्टी पिक्चर' ज़रूर देखनी चाहिए...

क्या इत्तेफाक है कि 'रॉकस्टार' और 'द डर्टी पिक्चर' के रिलीज़ होने की तारीखें लगभग अगल-बगल थीं। रॉकस्टॉर जहां छूटती है, 'डर्टी पिक्चर' उसी दर्शन (फिलॉसफी) को ठीक से पकड़ लेती है। रॉकस्टार के जनार्दन (रणबीर) को ज्ञान मिलता है कि ज़िंदगी में रॉकस्टार बनना है, बड़ा बनना है तो दर्द पैदा करो, ट्रैजडी से ही मिलेगी कामयाबी। फिर रणबीर जैसे-तैसे एक ट्रैजडी ढूंढ पाते हैं और रॉकस्टॉर बनते हैं। इधर डर्टी पिक्चर में रेशमा (विद्या बालन) को ट्रैजडी ढूंढनी नहीं पड़ती। वो ख़ुद ही एक ट्रैजडी है क्योंकि वो एक औरत है। ग़रीब है, ख़ूबसूरत भी नहीं है और सपने बड़े हैं। रेशमा को मालूम है कि इस 'मर्दाना' समाज की जन्नत अगर है तो औरत के कपड़ों के भीतर है तो वो अपनी ट्रैजडी का जश्न कपड़े उतारकर मनाना शुरू करती है। वो फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े सुपरस्टार(नसीरुद्दीन शाह) को साफ कहती है कि अब तक आपने 500 लड़कियों के साथ 'ट्यूनिंग' की होगी, मैं अकेली आपके साथ पांच सौ बार 'ट्यूनिंग' करने को तैयार हूं। फिर रेशमा को सिल्क बनने से कौन रोक सकता है। सिल्क यानी फिल्मी पर्दे पर 'सेक्स की देवी' जिसके दर्शन करने के लिए लोग टिकट ख़रीदते हैं और बाकी फिल्म को उसके हाल पर छोड़ जाते हैं। इंटरवल से पहले तक फिल्म एक तरह से देह का उत्सव है। बगावत का वो फॉर्मूला जो पूरी दुनिया हर दौर में अलग-अलग तरीकों से अपनाती रही है।
इंटरवल से पहले आप उस रेशमा को सिल्क बनते बार-बार देखना चाहेंगे क्योंकि वो एक गहरे दलदल में धंसकर भी कमल की तरह साफ लगती है। वो जो करती है, पूरी ठसक के साथ। मर्दानगी को मुंह चिढ़ाती हुई। जब फिल्म कहती है कि बड़े-बड़ों ने मुंह काला कर के ही नाम कमाया है, तो लगता है ये सिर्फ 80 के किसी संघर्ष की ग्लैमरस दास्तान नहीं, हर दौर का सच है। नैतिकता (MORALITY)के मुंह पर कालिख पोतती हुई फिल्म आगे बढती रहती है। नैतिकता का नारा बुलंद करते एक जुलूस का हिस्सा बनी एक औरत के हाथ में पोस्टर है CINEMA'S LOWEST LOW..और इसका इल्जाम भी एक औरत सिल्क पर! फिल्म का बेहतरीन दृश्य। ऐसे कई सीन हैं, जहां आप लंबी सांसे भरकर फिल्म को आगे बढ़ने देते हैं और यकीन मानिए वो सीन बिस्तर पर फिल्माए नहीं गए।


नसीरुद्दीन साहब जैसे बेहतरीन अभिनेता के लिए एक साधारण फिल्म में भी हमेशा कुछ न कुछ बचा ही रहता है। वो न होते तो विद्या बालन अकेले ही फिल्म की सारी वाहवाही लूट जातीं। विद्या बालन इस दौर की एक ऐसी खोज हैं जिसे हिंदी सिनेमा कई बार इस्तेमाल करना चाहेगा। क्या कमाल की एक्टिंग है। बेशक आप इंटरवल के बाद उठकर चले आइएगा, लेकिन विद्या के लिए ये फिल्म ज़रूर देखें। बिस्तर पर पड़ी सिल्क नसीरुद्दीन शाह के साथ 'ट्यूनिंग' कर रही है और अचानक दरवाज़े पर उनकी बीवी दस्तक देती है। नसीर सिल्क को छिप जाने के लिए कहते हैं। फिर बीवी अंदर आती है। फिर बाथरूम में छिपी सिल्क दरवाज़े के सुराख से झांककर देखती है कि कैसे एक मर्द तुरंत पति बन जाता है और नैतिकता (morality) भोलेपन से बिस्तर पर पड़ी रहती है। 'गंदी' सिल्क के पास अब दुनिया में वापस दाखिल होने के लिए बस एक चोर दरवाज़ा ही होता है। ख़ुद की 'असलियत' पहली बार उस छोटी सी रोशनी से साफ दिखती है और फिर आखिर तक दिखती है। उस अमीर कार के काले शीशे पर भी जब वो एक पॉर्न फिल्म से  बचते-बचाते भाग रही होती है या या फिर जब एक तरफ सिल्क के पीछे पूरा हुजूम होता है और दूसरी तरफ आधे खुले दरवाज़े पर खड़ी मां। सिल्क को भीड़ नहीं मां का प्यार चाहिए, मगर उसे मां नहीं मिलती, सिर्फ भीड़ मिलती है।
ले जाओ सब ये शोहरतें, ये भीड़, ये चमक
रोने के वक्त, हंसने की बेचारगी न हो....
इंटरवल के बाद फिल्म में इमरान हाशमी एक साफ-सुथरे कुएं में भांग की तरह हैं। पूरी फिल्म का ज़ायका ख़राब कर देते हैं। फिर अचानक आपको होश आता है कि धत तेरे की, हम एकता कपूर से किसी मास्टरपीस की उम्मीद कैसे करने लगे थे। इमरान हाशमी 'अच्छी, साफ-सुथरी' फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर की भूमिका में वैसे ही लगते हैं जैसे कोई आपसे सरदारों वाला मज़ाक करे और आपको हंसी भी न आए। ऐसा लगता है जैसे इंटरवल के बाद और पहले की फिल्में दो अलग-अलग फिल्में हैं। जैसे फिल्म बनाने वालों को अब भी ये भरोसा नहीं था विद्या और नसीर जो जादू कर चुके हैं, उतना एक फिल्म को हिट करने के लिए काफी होगा। उन्हें अब भी विद्या से ज़्यादा इमरान पर भरोसा है। इस भरोसे से हिंदी सिनेमा जितनी जल्दी उबरेगा, हम एक मुकम्मल फिल्म की उम्मीद कर सकेंगे।

रजत अरोड़ा को आप ONCE UPON A TIME IN MUMBAI में सुन चुके हैं। डायलॉग्स का वही जादू यहां भी होलसेल में मिलता है। आप कौन सा डायलॉग अपने साथ घर लेकर जाएं, समझ नहीं आता। ''जब शराफत अपने कपड़े उतारती है तो सबसे ज़्यादा मज़ा शरीफों को ही आता है।'' हालांकि, रजत को भी अपनी अच्छी कलम पर भरोसा नहीं है, इसीलिए वो 'अगर सिल्क दुनिया की आखिरी लड़की होती, तो मैं नसबंदी करा लेता' जैसे फूहड़ डायलॉग्स का भी सहारा लेते हैं।

पता नहीं हाल की कुछ फिल्मों को क्या हो गया है। वो शुरु होते-होते बहुत ठीकठाक लगती हैं और फिर ख़ुद में ऐसे उलझ जाती हैं कि आखिरी घंटा झेलना मुश्किल हो जाता है। हम सिल्क को 'जीतते' हुए देखना ज़्यादा पसंद करते। ठीक है कि फिल्म किसी पुरानी एक्ट्रेस 'सिल्क स्मिता' की कहानी पर आधारित है जिसने आखिर में खुदकुशी ही की थी। लेकिन क्या हम फिल्म की आज़ादी का इस्तेमाल कर सिल्क को एक औरत की तरह नहीं देख सकते, जिसके लिए खुदकुशी से भी बेहतर रास्ते होते। ग्लैमर क्या हर बार ग्लानि पर ही ख़त्म होता है। क्या सचमुच ये चमचमाती रौशनियां उसी मोड़ पर ले जाकर छोड़ती है जहां सिर्फ मायूसी है और ज़िंदगी महसूसने का आखिरी मौका। सिल्क को फिल्म के ज़रिए एक बेहतर ज़िंदगी मिलती तो शायद ज़्यादा अच्छा लगता। शायद मर्लिन मुनरो, मीना कुमारी, परवीन बाबी, विवेका बाबाजी जैसी कई दर्द भरी कहानियों पर मरहम जैसा असर करतीं।

मगर नही, फिल्म बनाने के लिए जिन तीन चीज़ों की ज़रूरत है, वो ज़रूरत पूरी की जा चुकी है। और वो ज़रूरत है Entertainment, Entertainment और Entertainment। फिल्म बनाने वालों को लगता है कि सिल्क की कहानी में इतना दिमाग खुजाने की ज़रूरत ही क्या है, जब पब्लिक कहीं और खुजाना चाहती है।

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

दिल्ली एक उलझन है, एक वेटिंग रूम है...

मुझे कई बार लगता है कि मैं किसी दिल्ली-विल्ली में नहीं रहता। मैंने आज तक लालकिला नहीं देखा, कुतुबमीनार नहीं घूमा और न ही ट्रेड फेयर में टिकट कटाकर घूमने गया हूं। मैं तो सिर्फ दो-तीन घंटे रोज़ाना मेट्रो में रहता हूं, फिर एक दफ्तर में और फिर अपने कमरे में। बाकी कब, क्या, कौन-सी दिल्ली में होता है, मुझे नहीं पता। टीवी पर आग-वाग दिखती है तो हम दिल्ली के दफ्तर में ही बैठकर एक-दूसरे से पूछते हैं कि ये कहां का सीन है। तो कोई कहता है दिल्ली का है। आज दिल्ली बंद है ना, भारत भी बंद है आज ! मैं शर्मिंदा होता हूं और खुश भी कि मेरे रास्ते में ये दिल्ली नहीं आती। मेरे रास्ते में तो एक हवाई दिल्ली आती है। ज़मीन पर पांव रखूं तो सीढ़ियां आती हैं और फिर आधे आकाश में सफर कर सीधा रिक्शे वाले के पास जा पहुंचता हूं जो शर्तिया दिल्ली का नहीं होता।  ये दिल्ली रहती किधर है भाई, मुझे इस दिल्ली से मिला दो कोई।

एक बार घर में बैठे तो बिहार से पापा का फोन आया कि ठीक तो हो। मैंने कहा, हां....आप ही ठीक नहीं लग रहे। तो बोले, टीवी पर दिखा रहा है कि दिल्ली में ब्लास्ट हो गया है। फिर मैंने दिल्ली के अपने कमरे में इंटरनेट पर देखा तो पता चला सचमुच दिल्ली में ब्लास्ट हो गया है। फिर मैंने पापा से कहा कि पापा दिल्ली बहुत बड़ी है और जहां ब्लास्ट हुआ है, वो दिल्ली तो मुझसे बहुत दूर है।
पापा खुश हुए और बोले अच्छा है उस दिल्ली से दूर ही रहो।

हालांकि, मैं जिस दिल्ली के करीब हूं, उसे देखकर भी पापा खुश होंगे, कहना मुश्किल है। हवाई चप्पल में ही सवेरे-सवेरे उठकर सबसे सस्ती फिल्म देखने का जुगाड़ दिल्ली ने ही सिखाया।  क्या ज़रूरी है कि रॉकस्टार देखने के लिए आप वीकेंड की किसी गोधूलि वेला में किसी के साथ का इंतज़ार करें। क्यों न ब्रह्म मुहूर्त में उठें (दिल्ली में ब्रह्म मुहूर्त 7-8 बजे को मान सकते हैं) और चल पड़े पास के मॉलनुमा मंदिर में दर्शन करने नरगिस फाख़री का। या फिर साहिब, बीवी और गैंगस्टर वाली माही गिल का।  40-50 रुपये में प्यार, ज़िंदगी का तमाम दर्शन जिन गद्दीदार कुर्सियों पर मिलता है, मेरी दिल्ली वहीं है। जहां मैं ख़ुद को कभी रॉकस्टार तो कभी दबंग समझने लगता हूं। अगर प्यार उलझन के अलावा कुछ नहीं है तो हिंदुस्तान का हर प्रेमी एक  'रॉकस्टार' है।

एक वक्त और पक्के तौर पर लगता है कि हम दिल्ली में ही हैं। जब छुट्टियों के मौके पर तीन महीने पहले भी घर जाने को सारे टिकट फुल हो जाते हैं और ज़िंदगी अटक-सी गई लगती है। तब लगता है दिल्ली एक वेटिंग रूम है जहां हर किसी को यहां से बाहर जाने का इंतज़ार है।

''जब हम बड़े होते हैं,
हमारे साथ बड़ी होती है उम्र...
और धुंधली होती है याद..
बीत चुके उम्र की...
हमारे साथ बड़ा होता है खालीपन....
छूट चुके रिश्तों का...
और बड़ा होता है खारापन,
आंसूओं का...
चुप्पियां बड़ी होती हैं,
और उनमें छिपा दर्द भी..
ये तमाम शहर बड़े होते हैं हमारे साथ...
हमारे-तुम्हारे शहर...
शहरों की दूरियां घटती हैं,
रिश्तों की नहीं घटती...''
निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 26 नवंबर 2011

विकल्प

हमारे पास कोई विकल्प नहीं था,

टी.वी. के आगे बैठकर लाशें गिनने के सिवा...
गोलियों से छलनी होकर रेशा-रेशा बिखरे कांच के टुकड़े,
चुभो रहे थे मर्दानगी को...
और मूकदर्शक बने रहने के सिवा,
हमारे पास कोई विकल्प नहीं था..

हम कर भी क्या सकते थे,
जब सदी के महानायक के पास भी विकल्प नहीं था...
बायें हाथ में रिवॉल्वर थामे,
वो नहीं कर सकता था,
मौत का सामना,
इसीलिए बंदूक को तकिया बनाकर,
लेनी पड़ी चैन की नींद...

कोई विकल्प नहीं था
उस सफ़ेदपोश के पास,
उस दरवाज़े पर जाकर घड़ियाली आंसू बहाने के सिवा,
जहां नहीं गया था वो पहले कभी
या कोई कुत्ता भी....
विकल्प था उस पिता के पास,
जो जवान बेटे की मौत पर मौन था,
उसने चुप्पी तोड़ी तो भाग गया
दुम दबाकर सफ़ेदपोश,
उन्हीं गलियों से,
जहां कुत्ते भी जाना पसंद नहीं करते....

विकल्प था कुछ ज़िंदा दीवानों के पास,
सो लिखा उन्होंने,
अपने ख़ून से
ज़िंदा रहने का नया इतिहास.....
आप उन्हें किसी भी नाम से बुला सकते हैं,
सालस्कर, संदीप, करकरे...
क्या फर्क पड़ता है....

हमारे पास कोई विकल्प नहीं...
सिवाय मोमबत्तियों की आग सेंक कर गर्म होने के....
भीतर मर चुकी आग को सुलगाने के लिए
हमें अक्सर ज़रूरत पड़ती है,
चंद बेक़सूर लाशों की.....

दरअसल,
चाय की चुस्की,
एफएम का शोर,
ख़बर बेचते अखबार,
थक चुकी फाईलें,
ट्रैफिक का धुंआ,
बोनस का इंतज़ार
वगैरह-वगैरह....
कभी कोई विकल्प ही नहीं छोड़ते,
एक दिन या एक पल भी,
ज़िंदा लोगों की तरह ज़िंदगी जीने का,
ज़िंदा लोग माने....
सालस्कर, संदीप, करकरे...
आप उन्हें किसी भी नाम से पुकार लें...
क्या फर्क पड़ता है....

निखिल आनंद गिरि
(तीन साल पहले 26/11/2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद लिखी गई कविता )

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

उसे बचपन में सपने देखने की बीमारी थी..

एक दिन मेरी उम्र ऐसी थी कि मुझे बस प्यार करने का मन होता था। तब तुमसे मिलना हुआ और उस एक दिन हमने बहुत प्यार किया था। फिर वो दिन कभी नहीं आया। हमने उस रिश्ते का कोई नाम तो दिया था। क्या दिया था, ठीक से याद नहीं। उस नाम पर तुम्हें बहुत हंसी आई थी। तुम्हारा हंसना ऐसे था जैसे कोई मासूम बच्चा गिर पड़े और उसकी चोट पर मां खिलखिलाकर हंसती रहे। जैसे कोई रोटी मांग रहा हो और आप उसकी पेट पर लात मारकर हंसते रहें। फिर मैंने तुम्हें यूं देखा जैसे कोई कोमा में चला जाए और किसी के होने न होने से कोई फर्क ही नहीं पड़े। मैं तुमसे नफरत नहीं करता। नफरत करने में भी एक रिश्ता रखना पड़ता है। मैं तो तुमसे नफरत भी नहीं करना चाहता। यानी कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता।


उसे सपने बहुत आते थे। उसके सपनों में एक पेड़ आता जिस पर कई तरह के फूल होते थे। वो सभी फूल एक ही रंग के होते थे। वो रोज़ सारे फूल तोड़कर तेज़ी से कहीं भागती थी। रास्ते में रेल की एक पटरी होती थी जहां अक्सर उसे इसी पार रुक जाना पड़ता। वो झुंझला कर फूल को पटरी के नीचे रख देती। सारी खुशबू कुचल कर ट्रेन जैसे ही आगे बढ़ती, सपना ख़त्म हो जाता था। लड़की की शादी तय हो चुकी थी। उसकी मां उसे तरह-तरह की नसीहतें देने लगी। मां ने कहा कि अब तुम्हें कम सोने की आदत डाल लेनी चाहिए। लड़की ने चुपचाप हामी भरी। जबकि असलियत ये थी कि लड़की को रात में नींद ही नहीं आती थी।

मैंने बचपन में एक गुल्लक ख़रीदी थी। मासूमियत देखिए कि जब उसमें खनकने भर पैसे इकट्ठा हो गए तो मैं अमीर होने के ख़्वाब देखने लगा। मैंने और भी कई ख़्वाब देखे। जैसे मैं अंधेरों के सब शहर ख़रीद लूंगा और गोदी में उठाए समंदर में बहा आऊंगा। जैसे मुझे ज़िंदगी जीने के कई मौके मिलेंगे और मैं उसे बीच सड़क पर नीलाम कर दूंगा। फिर किसी बूढ़े आदमी पर तरस खाकर उसे एकाध टुकड़ा उम्र सौंप दूंगा।

मुझे बूढे लोग अच्छे नहीं लगते। क्योंकि वो इतने सुस्त दिखने के बावजूद मुझसे पहले मौत के इतने करीब पहुंच चुके होते हैं जहां पहुंचने का मेरा बहुत मन करता है।

निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 12 नवंबर 2011

पटना..सॉरी..दिल्ली...सॉरी अमेरिका...बिहार की राजधानी है !!

मैथिली का आइटम लोकगीत (गाम के अधिकारी हमर बड़का भइया हो)
छठ पर इस बार बिहार जाकर ऐसा लगा कि हमारे गांव-कस्बों से सभी मर्द बिहार छोड़कर दिल्ली-मुंबई-पंजाब चले गए हैं और सिर्फ पर्व-त्योहारों पर मुंह दिखाने के लिए ही वापस लौटते हैं....इस आधार पर कहीं ऐसा न हो कि बिहार जाने के लिए आने वाले वक्त में हमें बिहार जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़े। और कहीं आने वाले वक्त में किताबों में कहीं हम ये न पढ़ें कि दिल्ली बिहार की राजधानी है (या फिर मुंबई)। मुझे हर घर का एक न एक आदमी बाहर ही नौकरी करता नज़र आता है। पहले भी ऐसा होता रहा है मगर फर्क ये आया है कि पहले मजदूरी के लिए लोग जाते थे और अब मजदूरों के बॉस बनकर भी जाते हैं।
'सामा-चकवा' की मूर्ति
दिल्ली में कल एक अलग तरह के कार्यक्रम में जाना हुआ। (मेरा पहला अनुभव था)। मंडी हाउस के पास त्रिवेणी ऑडिटोरियम में 'सामा चकेवा' कार्यक्रम का आयोजन था। दावे के साथ कहता हूं बहुत से बिहारियों को भी नहीं पता होगा कि इस नाम का कोई पर्व बिहार से ताल्लुक रखता है। नाम सुना भी होगा तो बाकी और कुछ भी नहीं पता होगा। छठ के बाद मिथिला के पूरे इलाके में भाई-बहनों का ये ख़ास पर्व कई दिनों तक 'खेला' जाता है। बचपन में गांव की बहनों को अक्सर सामा-चकवा की मूर्तियों के साथ गीत गाते देखा-सुना है मगर इस बार बिहार में भी सामा-चकेवा की उतनी धूम नहीं दिखी। दिल्ली आकर दिखी तो मन गदगद हो गया। वहां वरिष्ठ साहित्यकार और लोककर्मी मृदुला सिन्हा ने अपने किसी बरसों पुराने लेख का ज़िक्र किया जो उन्होंने बिहार से पलायन की स्थिति पर लिखा था। उस लेख का शीर्षक था...'दिल्ली बिहार की राजधानी है..'। मुझे लगा यही तो हम आज भी सोच रहे हैं और देख रहे हैं। कम से कम बिहार के मर्दों की राजधानी तो दिल्ली हो ही गई है। हां, बिहार की लड़कियों को दिल्ली भेजने में अभी भी दो-चार बार सोचा जाता है क्योंकि यहां का 'माहौल' अच्छा नहीं है।

ख़ैर, पर्व से खेल और अब खेल से भव्य समारोह तक का सफर करने वाले सामा चकवा (चकेवा, चकवा, चकबा सब एक ही हैं..) का दिल्ली में भव्य आयोजन देखकर सबसे अच्छा ये लगा कि आयोजन करने वाले लोग एकदम नई उम्र के थे। 25 से 30 साल वाले दर्जन भर बिहारी नौजवान। आधे लोगों से मेरा परिचय था और आधे से वहीं हुआ। युवाओं के हाथ में आयोजन का असर भी बड़ा ख़ूबसूरत दिखा। घर में पर्दे के पीछे या अकेले में औरतों के गाए जाने वाले मिथिला के लोकगीत दिल्ली के इस ऑडिटोरियम में ऐसे पेश किए जा रहे थे जैसे मुंबई या दिल्ली के चकाचौंध भरे माहौल में सुनिधि चौहान ''शीला की जवानी....'' या ''जलेबीबाई...'' गा रही हों।  सच कहूं तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। ये वही दिल्ली है जहां मेटालिका (कितने लोग इस बैंड से वाकिफ हैं, मुझे नहीं पता) का एक कन्सर्ट 2700 की टिकट पर आप देखने जाते हैं मगर हुड़दंग के डर से शो रद्द हो जाता है। लेडी गागा आती हैं तो धुएं वाली रातों को दिखा-दिखाकर टीवी वाले ऐसा समां बांधते हैं कि जैसे बस यही सुनकर हिंदुस्तानी संगीत को मोक्ष मिलना तय था। सामा चकेवा के 'आइटम लोकगीत' सुनकर न तो कोई शोर होता है और न ही इसका टिकट एक भी रुपये का है। फिर भी लोगों की भीड़ है, और समय पर तालियां बजती हैं। एक बार उन लोगों को भी त्रिवेणी का मुफ्त रुख ज़रूर करना चाहिए जिनके मन में बिहार का मतलब हिंदी और भोजपुरी फिल्मों में अक्सर बाज़ारू साज़िश के तौर पर फिल्माया जाने वाला एक फूहड़, निहायती बुद्धू (जिसकी बोली और लहजा देखकर सिर्फ हंसा या दुत्कारा जा सके), अधपका शहरी किरदार ही बैठा हुआ है। मैंने देखा कि दिल्ली की सभ्य सड़कों पर 'सामा चकवा' के गीत गाती महिलाएं चल रही थीं तो कारवाले रुककर फोटो खींच रहे थे, 'बिहारी' कहकर हंस नहीं रहे थे।   

क्या पता बिहार से निकलकर दिल्ली-मुंबई तक पलायन कर कब्ज़ा कर चुके लोग अमेरिका या लंदन के किसी शहर में भी इसी तादाद में नज़र आएं और वहां हमारा कलुआ (भोजपुरी लोकगीतों का नया रॉकस्टार, ज़्यादा जानने के लिए यूट्यूब की मदद ले सकतें हैं) ''कलुआ कन्सर्ट'' में इतनी भीड़ जुटाए कि हज़ारों डॉलर ब्लैक में टिकट बिकें।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 9 नवंबर 2011

वो उजालों के शहर, तुम को ही मुबारक हों...

सहरा-ए-शहर में खुशबू की तरह लगते थे...
किस्से माज़ी के वो जुगनू की तरह लगते थे

हमने उस दौरे-जुनूं में कभी उल्फत की थी ,
जब कि ज़ंजीर भी घुँघरू की तरह लगते थे.

हर तरफ लाशें थी ताहद्दे-नज़र फैली हुईं
ज़िंदा-से लोग तो जादू की तरह लगते थे

ऊंगलियां काट लीं उन सबने ज़मीं की ख़ातिर
बाप को बेटे जो बाज़ू की तरह लगते थे...

मुझ को खामोश बसर करना था बेहतर शायद
हंसते लब भी मेरे आंसू की तरह लगते थे...

वो उजालों के शहर, तुम को ही मुबारक हों,
रात में सब के सब उल्लू की तरह लगते थे

दिन ब दिन रहनुमा गढते थे रिसाले अक्सर
चेहरे सब कलजुगी, साधू की तरह लगते थे
 
आज बन बैठे अदू कैसे मोहब्बत के 'निखिल'
वो भी थे दिन कि वो मजनू की तरह लगते थे
माज़ी - बीता हुआ कल
अदू - दुश्मन
 
निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

सुनो मठाधीश !


हिंदी की साहित्यिक मैगज़ीन पाखी के अक्टूबर अंक में प्रकाशित कविता।
रांची से एक पाठक और फेसबुक फ्रेंड प्रशांत ने ये कविता पढ़ी
और मुझे ये स्कैन कॉपी भेजी..उनका शुक्रिया..

ये कोई मठ तो नहीं

और आप मठाधीश भी नहीं...

कि जहां आने से पहले हम चप्पलें उतार कर आएं

और फिर झुक जाएं अपने घुटनों पर...

और आप तने रहें ठूंठ की तरह,

भगवान होना इस सदी का सबसे बड़ा बकवास है हुज़ूर !


काश! पीठ पर भी आंखे होती आपकी

मगर आपके तो सिर्फ कान हैं...

जिनमें भरी हुई है आवाज़

कि आप, सिर्फ आप महान हैं...


काश होती आंखे तो देख पाते

कि कैसे पान चबा-चबा कर चमचे आपके,

याद करते हैं आपकी मां-बहनों को...

क्या उन्हें लादकर ले जाएंगे साथ आखिरी वक्त में...

सब छलावा है, छलावा है मेरे आका !


वो कुर्सी जो आपको कायनात लगती है,

दीमक चाट जाएंगे उसकी लकड़ियों को,

और उस दोगली कुर्सी के गुमान में

आप घूरते हैं हमें..


हमारी पुतलियों के भीतर झांकिए कभी...

हमारे जवाब वहीं क़ैद हैं,

हम पलटकर घूर नहीं सकते।

अभी तो पुतलियों में सपने हैं,

मजबूरियां हैं, मां-बाप हैं...

बाद में आपकी गालियां हैं, आप हैं...


चलिए मान लिया कि सब आपकी बपौती है...

ये टिपिर-टिपिर चलती उंगलियां,

उंगलियों की आवाज़ें...

ये ख़ूबसूरत दोशीज़ा चेहरे

जिनकी उम्र आपकी बेटियों के बराबर है हाक़िम...

हमारी भी तो अरज सुनिएगा हुज़ूर...

हुकूमतें हरम से नहीं, सिपहसालारों से चलती हैं...

निखिल आनंद गिरि
(http://www.pakhi.in/oct_11/kavita_nikhil.php)

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

मल्टीप्लेक्स से नहीं निकलने वाला कोई महानायक...

रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया...
हाल में ही रिलीज़ हुई थी फिल्म I AM KALAM...ढाबे में काम करने वाले एक मासूम बच्चे के सपनों की कहानी है.....बच्चा पूर्व राष्ट्रपति कलाम जैसा बनना चाहता है और उसका साथी अमिताभ की धुन में मगन है...फिल्म कलाम का सपना देखने वाले बच्चे के साथ खड़ी होती है...क्या ये एक साफ संदेश नहीं माना जा सकता कि अमिताभ के हसीन सपने से आगे देखने का रास्ता मल्टीप्लेक्स ने ढूंढ लिया है....मेरे पसंदीदा अभिनेता के जन्मदिन पर ब्लॉग के ज़रिए ऐसे ही कुछ सवालों का तोहफा...ये लेख सिनेमा की एक मैगज़ीन 'सतरंगी संसार 'में भी छपा है...

अ से अक्लमंद, म से मिलनसार, त से ताक़तवर, भ से भरोसेमंद। बचपन में स्कूल लाइब्रेरी की किसी किताब के पहले पन्ने पर अमिताभ का यही परिचय लिखा मिला था। तमाम दौलत और शोहरत हासिल कर चुके अमिताभ की जटिल हस्ती को समझ पाना उतना ही मुश्किल है जितना ये बात अजीब लग सकती है कि अपने पिता डॉ हरिवंश राय बच्चन को आज भी वो ‘बाबूजी’ कहते हैं। कितनी अजीब बात है कि ये अमिताभ ही हैं जिन्हें बॉलीवुड के पर्दे पर उनके किए सब गुनाह उन्हें नायक बना देते हैं। नायक नहीं, महानायक। ऐसा महानायक जिसकी नकल में शाहरुख भी ‘किंग’ कहे जाने लगते हैं। फिर पर्दे का महानायक अपनी फिल्मी छवि को राजनीति से लेकर दूसरी फायदे की सौदेबाज़ियों में भुनाना चाहता है तो जनता ताड़ लेती है। उन्हें बार-बार खोल बदलने पड़ते हैं और वो ये करने में भी क़ामयाब रहते हैं। सचमुच, मौजूदा दौर में कोई इस तरह का आदमी ही असली नायक हो सकता हैं।

हिंदुस्तान में ‘मास अपील’ सबसे बड़ा सच है। The End Justify The Means…की तर्ज़ पर। अमिताभ ने इस सच को बखूबी समझा है। पोलियो की दो बूंदे पिलाने की अपील करने वाले अमिताभ जब गुजरात के ब्रांड अंबैसडर या फिर मराठी मानुसों के मंच पर अपनी आंखों और आवाज़ में भलमनसाहत के साथ बड़ा बनने की कोशिश करते हैं तो उन्हें ये अच्छी तरह मालूम होता है कि उनका ‘क़द’ इतना बड़ा है कि उनकी आंखों में आंखे डालने का माद्दा उनके रहते कम ही लोग जुटा पाएंगे। क्या हम कभी कह पाएंगे कि तिहाड़ के लिए ही धरती पर ‘अवतरित’ हुए अमर सिंह के साथ-साथ बार-बार गलबहियां करने का रिश्ता अवसरवादिता के अलावा और क्या कहलाता है।

ये इत्तेफाक ही है कि अपने सबसे बुरे दौर में भी जब अमिताभ मजबूरी में छोटे पर्द पर आए तो छोटे पर्दे का क़द भी बड़ा हो गया। दरअसल, स्क्रीन पर अपनी सहजता के मामले में अमिताभ का कोई सानी नहीं है। पिछले दस सालों सालों के फ्रेंच कट अमिताभ की दसेक फिल्मों को छोड़ दें तो हर फिल्म में वो एक ही तरह के नज़र आते हैं, फिर भी उनसे कोई बोर नहीं होता। छोटे पर्दे पर भी उन्हें बार-बार करोड़पति बनाने के लिए ही बुलाया गया फिर भी ताज्जुब नहीं होता। होता भी है तो कहने की हिम्मत नहीं करता कि अमिताभ आप जिस दौर के महानायक थे, वो दौर कोई और था। इस दौर में आपकी फ्रेंच दाढ़ी और उसके पीछे से आती गहरी आवाज़ सिर्फ सबसे बिकाऊ कही जा सकती है, सबसे लोकप्रिय या महान नहीं।

हम उस दौर में धरती पर नहीं थे जब अमिताभ महानायक हुआ करते थे। अवशेषों के आधार पर अगर सचमुच मान भी लेते हैं कि अमिताभ सचमुच कभी के महानायक रहे थे तो क्या ये दौर बीता हुआ नहीं मान लेना चाहिए। अब मल्टीप्लेक्स का दौर है और मल्टीप्लेक्स की फिल्मों से कोई महानायक निकलने की उम्मीद किया जाना ठीक उसी तरह है जैसे नाक से गाने वाले किसी गवैये को संगीत का ‘इंडियन आइडल’ मान लेना।

माँ के प्यार जितनी अथाह दुनिया के
बित्ते भर हिस्से में,

सिर्फ नाच-गाकर
बन सकता है कोई,
सदी का महानायक

फिर भी ताज्जुब नहीं होता।

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

जल्दी से छुड़ाकर हाथ...कहां तुम चले गए...

जगजीत सिंह को कई लोग ग़ज़लजीत सिंह भी बुलाते हैं...क्यों कहते हैं, ये बताने की ज़रूरत नहीं। कई बार बचपन में लगता था कि उनकी गाई ग़ज़लें गाकर एक-दो बार प्रेम किया जा सकता है, तो उनकी कितनी प्रेमिकाएँ रही होंगी। ग़ज़लों के हिंदुस्तानी देवता को आखिरी सलाम...उनकी याद में मोहल्ला पर ये छोटी-सी पोस्ट भेजी थी...यहां भी लगा रहा हूं.. 
कहां तुम चले गए...
जगजीत सिंह पहली बार ज़िंदगी में दाखिल हुए होठों से छू लो तुम के ज़रिए...तब ग़ज़लों से दिल के तार जुड़े नहीं थे और विविध भारती पर बजने वाले फिल्मी गीत कंठस्थ याद करने का सुरूर चढ़ा था। जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा, सब जीता किए मुझसे, मैं हरदम ही हारा...इतनी सादी-सच्ची बात कि लगता इतना सुनाने के बाद किसी को किसी से भी प्यार हो सकता है। पहली बार इस गाने को दूरदर्शन पर देखा और देखते ही राज बब्बर से प्यार हो गया। लगा कि राज बब्बर कितना बढ़िया गाते हैं। फिर थोड़ा बड़ा हुआ और अपने दोस्त के यहां गया तो उसके यहां ग़ज़लों का अथाह कलेक्शन पड़ा मिला। नया-नया कंप्यूटर आया था तो उस पर दोस्त को एक सीडी चलाने को कहा....शायद ग़ालिब की कोई ग़ज़ल थी। मैंने उससे कहा, ये तो राज बब्बर की आवाज़ है। दोस्त ने कहा, नहीं जगजीत सिंह हैं। ये देखो सीडी पर फोटो। फिर, जगजीत सिंह ज़िंदगी में यूं शामिल होते गए कि गुज़रने के बाद भी नहीं गए।

रोमांस की सारी नहीं तो बहुत सारी समझ जगजीत के स्कूल में ही कई पीढ़ियों ने सीखीं। हमने ग़ालिब की ग़ज़लें जगजीत से सीखीं, अपने बचपन से इतना प्यार जगजीत ने करना सिखाया, दोस्तों (ख़ास दोस्तों) को बर्थडे के कार्ड्स पर कुछ अच्छा लिखकर देने का ख़ज़ाना जगजीत की ग़ज़लों से ही मिला। जगजीत हमारी प्रेम कहानियों में कैटेलिस्ट या एंप्लीफायर की तरह मौजूद रहे। पहली, दूसरी या कोई ताज़ा प्रेम कहानी, सब में। वो न होते तो हमारे बस में कहां था अपनी बात को आहिस्ता-आहिस्ता किसी के दिल में उतार पाना। तभी तो गुलज़ार उन्हें ग़ज़लजीत कहते हैं, फाहे-सी एक ऐसी आवाज कि दर्द पर हल्का-हल्का मलिए तो थोड़ा चुभती भी है और राहत भी मिलती है।

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में नक्सली बम विस्फोट में जब एक साथ कई थानों के पुलिसवाले मारे गए थे, तो उसमें पापा बच गए थे। मैं तब प्रभात ख़बर में था, एकदम नया-नया। मैंने पापा से कहा कि अपने अनुभव लिखिए, मैं यहां विशेष पेज तैयार कर रहा हूं, छापूंगा। उन्होंने जैसे-तैसे लिखा और भेज दिया, शीर्षक छोड़ दिया। अगले दिन के अखबार में पूरा बॉटम इसी स्टोरी के साथ था। एक आह भरी होगी, हमने न सुनी होगी, जाते-जाते तुमने आवाज़ तो दी होगी। उफ्फ, जगजीत आप कहां-कहां मौजूद नहीं हैं, भगवान की तरह।

ज़ी न्यूज़ में कुछ ख़ास तारीखों पर काम करना बड़ा अच्छा लगता था.जैसे 8 फरवरी (जगजीत सिंह का बर्थडे)...हर रोज़ ज़ी यूपी के लिए रात 09.30 बजे आधे घंटे की एक स्पेशल रिपोर्ट प्रो़ड्यूस करनी होती थी। जगजीत के लिए काम करते वक्त लगता ही नहीं कि काम कर रहे हैं। लगता ये एक घंटे का प्रोग्राम क्यों नहीं है। आज उनके जाने पर नौकरी छो़ड़ने का बड़ा अफसोस हो रहा है। कौन उतने मन से याद करेगा जगजीत को, जैसे हम करते थे। आपकी ग़ज़लों के बगैर तो फूट-फूट कर रोना भी रोना नहीं कहा जा सकता।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

मुझे ये शहर तो ख़्वाबों का कब्रिस्तान लगता है..

जो पत्थर की तरह बस बेहिस-ओ-बेजान लगता है
वही चेहरा मुझे अक्सर मेरा भगवान लगता है..

हमारे गांव यादों में यहां हर रोज़ मरते हैं,
मुझे ये शहर तो ख़्वाबों का कब्रिस्तान लगता है..

ज़रा फुर्सत मिले तो देखिए उसको अकेले में,
वो गोया भीड़ में अच्छा-भला इंसान लगता है..

उजाले ही उजाले हों तो कुछ घर सा नहीं लगता..
अंधेरों के बिना भी घर बहुत वीरान लगता है..

मेरे ख्वाबो की गठरी को समंदर में बहा डालो,
मेरे कमरे में रद्दी का कोई सामान लगता है..

मैं किसको उम्र के इस कारवां में हमसफर समझूं.
मुझे हर शख्स बस दो दिन यहां मेहमान लगता है..

ज़रा मेरी तरह पत्थर पे सजदे करके भी देखे
जिसे भी इश्क नन्हें खेल सा आसान लगता है....

मैं ज़िंदा हूं तुम्हारे बिन, यक़ीं ख़ुद भी नहीं होता,
यहां पहचान साबित ना हो तो चालान लगता है..

निखिल आनंद गिरि

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

परछाईयों से प्यार और आखिरी सांस

मां से कभी कोई ऐसी चीज़ मांगी है आपने जो पूरी ही न का जा सके। दरअसल, ऐसा कुछ है ही नहीं जो मां के लिए मुमकिन नहीं। मासूम बच्चे का भरोसा कुछ ऐसा ही होता है। वो रात में सूरज और दिन में चांद मांग सकता है और मां उसकी आंखें बंदकर हथेली सहला दे तो लगता है सचमुच चांद ही होगा। हालांकि, आप भी जानते हैं कि ऐसा कुछ होता नहीं है। मां भी जानती है, मगर मासूम बच्चा नहीं जानता। जानता भी हो शायद मगर ऐसा मानना उसकी ज़िंद ने उसे सिखलाया नहीं है । प्यार में कोई तर्क नहीं काम करता कि आप क्या मांगते हैं और क्या चाहते हैं।

परछाईयों से प्यार किया है आपने। कितना क़रीब लगती हैं ना । जैसे बस हाथ बढ़ाया और छू लिया। मैंने एक बार हाथ बढ़ाकर सचमुच देखना चाहा तो फिर कोशिश ही करता रहा । फिर वो अचानक ग़ायब हो गई और फिर कभी नहीं लौटी। परछाईयों को दरअसल ये बिल्कुल पसंद नहीं कि कोई उन्हें छुए । वो सुबह की धूप में आपके साथ होने का भरम पैदा करती हैं और अंधेरे से पहले ही सच सामने होता है। अगर ये मान भी लें कि परछाई आपको खुशी देना चाहती है तो क्या ये सच झुठलाया जा सकता है कि आप और आपकी परछाई दो अलग-अलग ज़िंदगियां हैं, दो सीधी रेखाओं की तरह, जो हमेशा साथ-साथ तो हैं, मगर कभी मिल नहीं सकते।

उसके आंगन में दुख का पौधा इतना बड़ा हो गया था कि उसके फल खाकर ताउम्र गुज़ारा किया जा सकता था। एक बार सुख ने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी तो वो पहली नज़र में उसे पहचान ही नहीं पाया। । उसका चेहरा तो वही था मगर उम्र की धूल और दुख के घने साए में वो सब कुछ भूल बैठा था। सुख घड़ी भर को आया था मगर उसे लगा कि कहीं रह जाए । कहीं रुक जाए । दोनों अंदर आए, एक-दूसरे का हाथ पकड़े। दुख वाले पौधे के नीचे दोनों घंटों बैठे रहे। हालांकि, उन्होंने ज़्यादा बात नहीं की मगर सिर्फ बात करना ही बात करना नहीं होता।। कई बार जिस्म के रोएं भी बात करते हैं। आंखों की पुतलियां भी बात करती हैं। अहसास बात करते हैं। और वो बात साफ सुनी जा सकती थी। जाने का वक्त हुआ तो सुख की आंखें नम हो गईं। उसने अपनी हथेली में दो-चार बूंद आंसू भरे और दुख की जड़ में गिरा दीं। उसने देखा कि जड़ों में लिपटा कोई बहुत पुराना रिश्ता आखिरी सांसें गिन रहा है। चार बूंदों से उसे जी जाना चाहिए था मगर उसने आखिरी करवट ली और फिर हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया।

निखिल आनंद गिरि

बुधवार, 28 सितंबर 2011

वो भी मुझको रोता है !

हम-तुम ऐसे रुठे हैं,
जैसे कि मां-बेटे हैं...

सब में तेरा हिस्सा है,
मेरे जितने हिस्से हैं...

मस्जिद भी, मैखाना भी,
तेरी दोनों आंखें हैं...

मंज़िल भी अब भरम लगे,
बरसों ऐसे भटके हैं...

अब जाकर तू आया है,
मुट्ठी भर ही सांसे हैं...

नींद से अक्सर उठ-उठ कर,
ख़्वाब का रस्ता तकते हैं...

वो भी मुझको रोता है !
सब कहने की बातें हैं..

हर शै में तू दिखता है,
तेरे कितने चेहरे हैं?

सागर कितना खारा है
अच्छा है हम प्यासे हैं...
निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 26 सितंबर 2011

हर एक सम्मान ज़रूरी होता है....

24 सितंबर की शाम यादगार थी। दिल्ली के हिंदी भवन में एक सामाजिक संस्था 'अंजना' ने अपने सालाना साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान पांच युवा रचनाकारों को सम्मानित किया। तीन कहानीकार विवेक मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ और दो कवि विपिन चौधरी, निखिल आनंद गिरि (यानी मैं)। दिल्ली में किसी मंच पर कविताओं के लिए सम्मान लेने का ये पहला मौका था। अच्छा लगा। कुछ तस्वीरें बांट रहा हूं, अपने ब्लॉग के दोस्तों के लिए....आपको भी अच्छा लगेगा।
 मैं, मशहूर कथाकार मैत्रेयी पुष्पा और सम्मान.. 

कविताओं के लिए दाद देतीं मैत्रेयी

मंच पर (बाएं से) युवा आलोचक दिनेश, कथाकार मैत्रेयी पुष्पा, कथाकार और संपादक प्रेम भारद्वाज, युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ, युवा कथाकार अनुज

ज़रा फोटो छप जाने दे...

कार्यक्रम में मौजूद दर्शक..सबसे आगे मि. एंड मिसेज़ प्रेमचंद सहजवाला, जिनकी फुर्ती से उम्र का पता ही नहीं चलता..

बुधवार, 21 सितंबर 2011

ऐसा भी क्या हुआ कि उसे इश्क हो गया...

खुशबू के नाम पर हुए सौदे बहार में
छुपना पड़ा गुलों को भी दामाने-ख़ार में

बरसों के बाद टूटा वो तारा फ़लक से रात,
फिर से हुआ सुकून बहुत, इंतज़ार में...

ऐसा भी क्या हुआ कि उसे इश्क हो गया
कुछ तो कमी ही थी मां के दुलार में...

एक रोज़ ख़ाक होंगे सभी जीत के सामान
रखा नहीं है कुछ भी यहां जीत-हार में...

वहशी हुए तो घर में ही करने लगे शिकार
जंगल से ही उसूल भी लेते उधार में..

सब रहनुमाओं ने किए अपने पते भी एक
मिलना हो आपको तो पहुंचिए तिहाड़ में...

जिस फूल की तलब में गुज़री तमाम उम्र
वो फूल ही आया मेरे हिस्से, मज़ार में...

निखिल आनंद गिरि

 

शनिवार, 17 सितंबर 2011

मुझे बार-बार ठुकराया जाना है...

चांद को आज होना था अनुपस्थित 
मगर वो उगा, आकाश में...

जैसे मुझे धोनी थी एड़ियां,
साफ करने थे घुटने, रगड़ कर...
तुमसे मिलने से पहले,
मगर हम मिले यूं ही....

हमारे गांव नहीं आने थे, उस रात
शहर की बातचीत में
मगर आए...

तुम्हारी हंसी में छिप जाने थे सब दुख,
मगर मैं नीयत देखने में व्यस्त था..

हमारी उम्र बढ़ जानी थी दस साल,
मगर लगा हम फिसल गए..
अपने-अपने बचपन में...
जहां मेरे पास किताबें हैं
और गुज़ार देने को तमाम उम्र
तुम्हारे पास जीने को है उम्र..
जिसमें मुझे बार-बार ठुकराया जाना है..
सांस-दर-सांस

हमें बटोरने थे अपने-अपने मौन
और खुश होकर विदा होना था...

मुझे सौंपनी थी आखिरी बरसात
तुम्हारे कंधों पर,
मगर तुम्हारे पास अपने मौसम थे...

मुझे तुमसे कोई और बात कहनी थी,
और मैं अचानक कहने लगा-
कि ये शहर डरावना है बहुत
क्योंकि रात को यहां कुत्ते रोते हैं
और मंदिरों के पीछे भी लोग पेशाब करते हैं..
इसीलिए रिश्तों से बू आती है यहां...

निखिल आनंद गिरि

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

पत्थर से कुचल दी जाएं प्रेम कहानियां...

शादियों को लेकर मुझे सिर्फ इस बात से उम्मीद जगती है कि इस दुनिया में जितने भी सफल पति दिखते हैं वो कभी न कभी एक असफल प्रेमी भी ज़रूर रहे होंगे। गलियों में, मंदिरों में या फिर मेट्रो में जाने वाली लड़कियों के चेहरे कभी गौर से देखे हैं आपने। एक-एक चेहरे के पीछे एक दर्जन कहानियां ज़रूर होती हैं। दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक अब तक ये डिकोड नहीं कर सका कि लड़की जब खुश है तो क्या सचमुच खुश है या फिर दुखी है तो क्या सचमुच दुखी है। दरअसल, लड़की जब वर्तमान में जी रही होती है तो एक साथ भूत और भविष्य में भी जी रही होती है। और यही वजह है कि अक्सर लड़कों की प्रेम कहानियां चाहे-अनचाहे ठोंगे बनाने के काम आती हैं। 

मुझे लगता है कि बड़ी कंपनियां सिर्फ इसीलिए बड़ी नहीं होतीं कि उनकी सालाना आमदनी बड़ी होती है। कई बार तो सेक्यूरिटी गार्ड का रौब भी कंपनी को बड़ा बना देता है। आप चाहें फलां कंपनी में फलां टाइप ऑफिसर ही क्यों न हों, दूसरी फलां कंपनी में पैदल या रिक्शे उतरकर घुसिए, गार्ड आपको आपकी औकात बता देगा। ये उनके प्रति कोई दुर्भावना नहीं, कंपनी राज में उनकी क़ीमत का नमूना है।

आपने अगर प्रेम किया होगा, तो पत्थर भी देखे होंगे। ये वाक्य अगर दूसरी तरह से बोला जाए तो शायद उतना सच नहीं लग सकता है। मैंने प्रेम किया है और पत्थर भी देखे हैं। यानी प्रेम पहले आपके भीतर से तरल बनाता है, बाहर से सरल बनाता है और फिर जब आप समर्पण की मुद्रा में होते हैं तो पत्थर से कुचल दिए जाते हैं। ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसने दुनिया के सभी मर्दों को भीतर से और मज़बूत बनाया है। मैं अपवाद कहा जा सकता हूं

एक प्रेमकथा सुनाता हूं। छोटी-सी है। शहर के बीचों बीच गांव नाम का एक गांव था जिसमें गांव के अवशेष तक नहीं बचे थे। चूंकि वो शहर था, इसीलिए वहां एक बार प्रेमिका अपने प्रेमी से मिलने आई। और चूंकि वो गांव था इसीलिए प्रेमी के घर बिजली रहती नहीं थी। वो अंधेरे में देख सकने का आदी था, मगर प्रेमिका नहीं थी। वो थोड़ी देर बैठे और एक-दूसरे को चूमने लगे। फिर, प्रेमिका ने एक चाकू प्रेमी की गर्दन पर रख दिया। प्रेमी को अपने ख़ून का रंग साफ दिख रहा था, मगर वो अनजान बना रहा, जब तक उसकी जान नहीं चली गई। हालांकि, प्रेमिका को कोई इल्ज़ाम नहीं दिया जा सकता क्योंकि अंधेरे में उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता था। ये सरासर प्रेमी की गलती थी कि उसने अंधेरे में चीखना भी ज़रूरी नहीं समझा क्योंकि उसका ध्यान सिर्फ चुंबन पर था। और अंधेरे में उस चूमने की आवाज़ सुनी जा सकती थी।

निखिल आनंद गिरि

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

अंधेरे में सुनी जाती हैं सिर्फ सांसें...

एक सांस का मतलब एक सांस ही नहीं होता हर बार...
और ये भी नहीं कि आप जी रहे हैं भरपूर

मोहल्ले का आखिरी मकान
जहां बंद होती है गली
जहां जमा होता है कचरा
या शहर के आखिरी छोर पर
जहां जमा होता है डरावना अकेलापन
वहां जाकर पूछिए किसी से एक सांस की क़ीमत

या फिर वहां जहां जात पूछ कर रखे जाते हैं किराएदार
और ग़लती से आपका मकान मालिक
एक दिन पूछ देता है नाम
और जब आप सांसे भर कर बताते हैं सिर्फ नाम
तो अगली सांस भरने से पहले ही 'बाप' का नाम
यानी जन्म लेने भर से ही ज़रूरी नहीं
कि आप जब तक जिएं हर जगह सांस ले सकें...

पिता जब ताकते हैं आखों में
शाम को देर से आने पर
या मां पकड़ लेती है कोई गलती
जो नहीं की जाती हर किसी से साझा
सांसें हो जाती है सोने-चांदी से भी क़ीमती

अगर भूल गए हों आप कोई नाम
या भूलने लगे हों खुश रहने के तरीके
तो बंद आंखों से एक सांस भरना
ज़रूरी हो जाता है बहुत

सांसें तब भी ज़रूरी हैं
जब ज़रूरी नहीं लगता जीना
या फिर सबसे ज़्यादा ज़रूरी लगता हो
यानी तब जब आप सच के साथ हों
एकदम अकेले....एक तरफ
और पूरी दुनिया दूसरी तरफ

या तब भी जब आखिरी कुछ सांसे ही बची हों
और मिलना बाकी हो उनसे
जिन्होंने आपके साथ बांटी हो सांसें....
एकदम अंधेरे में...
जब दिखता नहीं कुछ भी
और सिर्फ सुनी जा सकती हो सांसें...

निखिल आनंद गिरि

रविवार, 28 अगस्त 2011

लोकतंत्र का अगला भाग...अंतराल के बाद

13 दिनों तक किसी सुपरहिट फिल्म की तरह हाउसफुल' चले अन्ना के 'सेलेब्रिटी' आंदोलन का ऐसा सुखांत (happy-ending) शायद पहले से ही सोचकर रखा गया था। आंदोलन की शुरुआत में जिस तरह के तेवर सरकार के थे, संसद की एक बहस में ही सब ऐसे मान गए कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। पूरी संसद में कोई मतभेद ही नहीं दिखा। क्या वाकई ये लोकतंत्र में संभव है, पता नहीं।
एक दलित और एक मुसलिम परिवार की बच्ची आती है और भगवान बन चुके अन्ना को दिल्ली जल बोर्ड का पानी पिलाकर अनशन तुड़वाती है। इसे फिल्मों की भाषा में poetic justice कह सकते हैं। यानी सबको खुश करने की कोशिश। मगर, लोकतंत्र इसमें भी नहीं दिखता। एक पूर्वनियोजित, सुसंयोजित, राजनैतिक कार्यक्रम ज़रूर दिखता है, जैसा कि लोकप्रिय मंच संचालक कुमार विश्वास अन्ना के मंच से बार-बार कह भी रहे थे।
ख़ैर, एक ग़रीब गांव के अन्ना ने जिस तरह से मेट्रो भारत की राजधानी दिल्ली में 13 दिनों तक समां बांधे रखा, वो काबिलेतारीफ है। एक युवा होने के नाते देश के बहरों को आवाज़ सुनाने के लिए किसी भी तरह की गूंज में शामिल होना बुरा नहीं है, मगर सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ एक कार्यक्रम भर था, जिसकी तारीख और रूपरेखा पहले से तय थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब संसद के बजाय एनजीओ और दूसरे गुट सरकारें चलाएंगे। इस पर भी सोचना ज़रूरी है, नहीं तो डेमोक्रेसी की म्यूज़िकल चेयर के खेल में जो आखिर में हमेशा खड़ा रह जाएगा, वो हम-आप ही होंगे...

पहले गालियों में आती थी बहन-माएं...
आजकल आती हैं नारों में...
वंदे मातरम...

राजधानी में बढ़ गए हैं देशभक्त,
बढ़ गए हैं बुद्धिजीवी...
कार्यक्रमों की तरह आंदोलन भी...

वो मेट्रो में चढ़कर आते हैं
और एसी बसों में भी...
अधूरा काम छोड़कर दफ्तर का...
लड़कियां आती हैं बहाने छोड़कर..
सुना है स्वादिष्ट मिलते हैं गोलगप्पे
रामलीला मैदान में...
जहां होते हैं रोज़ आमरण अनशन

अदालतों में घिस गए हाथ...
घिस गए पन्ने,
गीता-कुरान के...
सच बोलने की झूठी कसमें खा-खाकर
अब कानून से बनेंगे इमानदार...
लोकतंत्र की सब बैसाखियां हमारे लिए...

सब रहनुमा हमारे लिए,
हमारे लिए सब बेईमान,
सब तालियां, सारे जयघोष
हमारे लिए सब भगवान...

सड़कें जाम, लब आज़ाद...
फिर आया पचहत्तर याद...
लोकतंत्र का अगला भाग..
छोटे से अंतराल के बाद...

निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 20 अगस्त 2011

अन्ना, आम आदमी और राजनीति...

अन्ना के नेतृत्व में देश भर में जिस तरह एक आंदोलन जैसी तस्वीर बनी है, उस पर वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश का ये लेख...हरिवंश जी झारखंड के सबसे चर्चित दैनिक प्रभात ख़बर के प्रधान संपादक हैं...

अन्ना के आंदोलन को समाज कैसे देखता है? एक नमूना. एक मित्र हैं, हमारे. एक होटल में मामूली कर्मचारी. ओर्थक शब्दावली में, इस देश के निम्न आयवर्ग में से एक. ईमानदार. घोर परिश्रमी हैं. अपढ़ परिवार से. पर अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए रात-दिन खटते हैं. राजनीतिक रूप से अत्यंत सचेत हैं. 15 अगस्त को मिले. अखबार में हूं, तो वह मन की बात शेयर (साझा, बांटना या कहना) करते हैं.


पूछा, अन्ना क्यों आंदोलन कर रहे हैं? मैं उनका चेहरा देख रहा था. फ़िर खुद बोले. उनके न बाल-बच्चे हैं. न परिवार है. न कोई सगा-संबंधी. न उनका अपना कोई बैंक अकाउंट (खाता) है. फ़िर किसके लिए वह लड़ रहे हैं? फ़िर खुद ही बताया. पहले वह अपने गांव (रालेगांव, सिद्धी, महाराष्ट्र) के लिए लड़े. सबको साथ लेकर. गांव को संपन्न बनाया. शराबबंदी करायी. जो भारतीय मूल्य-संस्कार खत्म हो रहे हैं, उन्हें गांव में बोया. अब वह देश का अनोखा सुंदर और समृद्ध गांव है.

क्या आज के एक राजनेता ने भी ऐसा एक गांव बना कर दिखाया है? अपना गांव ठीक करने के बाद वह महाराष्ट्र सरकार के भ्रष्टों से लड़े. शिव सेना, बीजेपी से लड़े. अब वह देश के लिए लड़ रहे हैं. फ़िर ऐसे आदमी को, जिसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है, न परिवार है, न बाल-बच्चा, न निजी एजेंडा है, जो गांव-समाज, राज्य और देश के लिए जीवन उत्सर्ग करने को तैयार है, उसे सत्याग्रह की इजाजत क्यों नहीं? फ़िर उस मित्र ने कहा कि क्या गांधी जी के देश में सत्याग्रह, आंदोलन, धरना पर प्रतिबंध लग गया है. अगर आज के शासक अंगरेजों की जगह होते, तो क्या गांधी का उदय हुआ होता? अपने मित्र के सवालों का जवाब नहीं दे पाया.

टीवी पर अन्ना के दृश्य देखकर वह सवाल पूछ रहे थे. याद आया गांधी के बारे में एक अंगरेज आइसीएस की गोपनीय टिप्पणी. जो तत्कालीन सरकार को भेजी गयी थी. उसका आशय था, उस इंसान से लड़ना सबसे खतरनाक है, जिसका अपना कोई निजी एजेंडा नहीं है. अन्ना का मामला भी कुछ वैसा ही है. आम लोगों की निगाह में. जो अपने लिए नहीं लड़ता. जिसका न निजी लक्ष्य है, न धन-भूख व भोग की लालसा, न बाल-बेटा, न परिवार के सात पुश्तों के लिए बंदोबस्त की अभिलाषा, न संबंधी या रिश्तेदारों के लिए जागीर बनाने की बेचैनी, न स्विस या विदेशी बैंक में धन जमा करने की योजनाएं. तो उसके खिलाफ़ आप या सत्ता क्या लड़ेंगे? लोगों के मन में सवाल है कि जो कुछ कर रहे हैं, वह किसके लिए कर रहे हैं? देश के लिए ही न! हम सबके लिए ही न! लोग (बकौल मेरे मित्र) यह भी कहते हैं कि अन्ना नेता तो हैं नहीं. न विधायक हैं, न सांसद हैं. इसलिए उनके पास न विधायक फ़ंड है. न सांसद फ़ंड (सालाना पांच करोड़). इस तरह वह समाज के लिए जो कुछ कर रहे हैं, उसके लिए देश से पैसा तो नहीं लेते, न वेतन लेते हैं, न तनख्वाह लेते हैं. पर बात वह देश व गरीबों की कर रहे हैं. इस स्थिति में लोग जानना चाहते हैं कि फ़िर देश की असल चिंता करने वाले कौन हैं?

राजनीतिज्ञ या अन्ना जैसे लोग? मेरे मित्र का निजी दर्द था, मेरे पास एक टुटहा स्कूटर है. उसमें तेल और लुब्रिकेंट के दाम पिछले कुछ-एक वर्षो में कितने बढ़ गये हैं, क्या यह सरकार चलाने वालों या विपक्ष में बैठे लोगों को मालूम है, महंगाई कितनी बढ़ गयी है? क्या इसकी खबर इस देश की संसद को है? क्या इतना भ्रष्टाचार कभी हुआ? भ्रष्टाचार के कारण ही तो महंगाई बढ़ी है. अब अगर अण्णा भ्रष्टाचार कम करने की बात कर रहे हैं या उसके लिए आंदोलन चला रहे हैं, तो वह गलत कैसे? मेरी टिप्पणी थी, इतने गुस्से में क्यों हैं? धैर्य से बताया कि कल अन्ना गिरफ्तार हो जायेंगे? फ़िर आंदोलन खत्म हो जायेगा? उस साधारण इनसान का जवाब था, आप भूल रहे हैं.

1942 में गांधी पकड़े गये, तो 1947 में देश आजाद हुआ. 1974 में जेपी का आंदोलन शुरू हुआ, तो 1977 में कांग्रेस केंद्र से साफ़ हुई. इसलिए अन्ना की गिरफ्तारी का असर अपरिहार्य सच है. उससे राजनीतिज्ञों को मुसीबत होगी. उनके आंदोलन ने लोगों का मन और दिल छुआ है. यह दिल की बात है, दिमाग की नहीं. जो बात दिल को छूती है, उसकी प्रतिक्रिया भी देर से मिलती है, पर मिलती जरूर है. आज जब अन्ना की गिरफ्तारी के बाद देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई, तो मुङो अपने मित्र की 15 अगस्त की कही बात याद आयी. यह प्रतिक्रिया पूरी राजनीतिक व्यवस्था के लिए चेतावनी है. एक गंभीर संकेत भी. अन्ना के पास न अपना संगठन है, न राजनीतिक दल है, न धन है, न लोग हैं. राष्ट्रीय क्षितिज पर उनका उदय बमुश्किल वर्ष-दो वर्ष पुराना है. एक तरह से वह एक अकेले इनसान हैं, जिनके पीछे कोई संगठित ताकत नहीं है. न कोई जमा-जमाया संगठन बल, तब देश में उनके पक्ष में इतनी बड़ी प्रतिक्रिया कैसे दिखी?

अब नये लोग राजनीति से जुड़ रहे हैं. सारे राजनीतिक दलों के सक्रिय सदस्यों को जोड़ दें, नक्सल और आरएसएस तक या इन जैसे संगठनों के लोगों को भी शामिल कर लें, तो देश की 121 करोड़ की आबादी में से, इन सारे संगठनों से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता अधिकतम पांच-सात करोड़ होंगे. 121 में से यह सात करोड़ घटा दें. 114 करोड़ की आबादी भारतीय राजनीति से बाहर बसती है. अन्ना की कांस्टीच्यूयंसी (समर्थक वर्ग) इस 121 करोड़ में है. उनके अभियान में नये लोग राजनीति से जुड़ रहे हैं. नया मध्य वर्ग जुड़ रहा है. नये युवा शरीक हो रहे हैं. अगर यह आंदोलन पसरा, तो बड़ी संख्या में बेरोजगार या इस व्यवस्था से क्षुब्ध लोग भी जुड़ेंगे. यह वर्ग पहले वोट नहीं देता था, राजनीति से नफ़रत करता था, अब यह वर्ग राजनीति से जुड़ा, तो शासन का गणित बदल जायेगा. फ़र्ज करिए, देश की मौजूदा राजनीति की जो नियति पांच-सात करोड़ लोग अब तक तय कर रहे थे, अगर उनमें दस-बीस करोड़ नये लोग शरीक हो गये, तो हालात क्या होंगे? अन्ना के आंदोलन की एक और खासियत. आइडियोलोजी (विचार), राजनीति, संगठन से युवा विमुख हो रहे थे.

खासतौर से 1991 के उदारीकरण की अर्थनीति के बाद. अन्ना के आंदोलन ने उस वर्ग को भी उद्वेलित किया है. नाटक से, संगीत से, थियेटर से, सड़क पर अभिनय-नुक्कड़ नाटक से आंदोलन में जान डालने का काम देश में दो-तीन दशकों बाद हो रहा है. ये सारी ताकतें या नये प्रयोग या संकेत या हस्तक्षेप, आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति का प्रोफ़ाइल व चेहरा बदल देंगे. इस आंदोलन ने नब्ज पर हाथ डाला है. हाल ही में ‘स्टेट ऑफ़ द नेशन सर्वे’ हुआ. उस सर्वे की महत्वपूर्ण बात है, यह निष्कर्ष कि भ्रष्टाचार कैसे बड़ा मुद्दा है? 1972 से भी अधिक, इस आंदोलन को समर्थन है. ये तथ्य आने वाले दिनों में राजनीति को गहराई से मथेंगे. बदलेंगे.

मेरे मित्र की एक और टिप्पणी थी. चूंकि वह होटल में रहते हैं, तो टीवी खूब देखने को मिलता है. इसलिए हालात से वाकिफ़ हैं. कहा, कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का बयान आपने सुना सर? प्रश्नवाचक चेहरा देखकर बोला. जरा देख लीजिए. अन्ना को वह कह रहे हैं कि ‘तुम’ किस हैसियत से भ्रष्टाचार के सवाल उठाते हो. मेरे मित्र का आशय 14 अगस्त को कांग्रेस संगठन व सरकार द्वारा अन्ना पर हमलावर रुख और आरोपों से था. आरोपों से अधिक भाषा से. कहा, सर, दोनों की उम्र देखी है आपने. क्या अन्ना को उन्हें ‘तुम’ कहना चाहिए? अण्णा की शादी हुई रहती, तो उनके पोते मनीष तिवारी की उम्र के होते. फ़िर मेरे मित्र ने सुनाया. मेरे होटल में दो-तीन पढ़े लोग आपस में बात कर रहे थे कि कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी पेशे से वकील हैं. गृह मंत्री पी चिदंबरम भी वकील हैं. कांग्रेसी अभिषेक मनु सिंघवी भी वकील हैं. कपिल सिब्बल साहब भी वकील हैं. गांधीजी कहा करते थे कि जिस समाज में वकील और डॉक्टर अधिक हो जायें, वह समाज बीमार होता है, तो क्या कांग्रेस में वकीलों की भरमार उस महान संस्था की क्षय का प्रतीक नहीं? वकीलों की तो कीमत तय होती है. जो फ़ीस दे, वह उनसे अपने पक्ष में बात कराये. (सिद्धांतवादी, प्रतिबद्ध व आदर्शवादी वकील कृपया मेरे मित्र की इस राय को क्षमा करेंगे, यह वैसे लोगों पर लागू नहीं है.)

मेरे मित्र के अनुसार अण्णा को ‘तुम’ कहने के लिए या अपशब्द कहने के लिए माफी मिले, तो कहने वाले कहेंगे ही. उसने कहा कि होटल में वही दो लोग बात कर रहे थे कि केरल में, केरल की यूडीएफ़ सरकार ने (जिसमें मुख्य दल कांग्रेस है) एक कंपनी पर भ्रष्टाचार व धोखाधड़ी का मामला दायर किया है. वहां कांग्रेसी सरकार उस कंपनी के खिलाफ़ लड़ रही है. पर उस कंपनी के पक्ष में कांग्रेस के ही एक केंद्रीय प्रवक्ता वकील अदालत में बहस कर रहे हैं. अब आप ही बताएं कि ऐसे परस्पर विरोधी चरित्र के लोग अगर कांग्रेस जैसी संस्था में होंगे, तो उसका भविष्य क्या होगा? मेरे मित्र का यह भी निष्कर्ष था. अण्णा धोती, कुरता व गांधीवादी टोपी पहनते हैं और बात-बात में गांधी का जिक्र करते हैं, तो उन्हें गांधी दर्शन विरोधी लोग कैसे सहन करेंगे? आज लगभग सारी सरकारें (अपवादों को छोड़कर) गांधी से दूर निकल गयी हैं.

प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने भाषण में 13 मिनट भ्रष्टाचार पर बोला. पर इसे रोकने के सवाल पर कहा कि कोई जादू की छड़ी नहीं है कि भ्रष्टाचार रोका जा सके. पहले भी इंदिरा जी, जब ऐसे आरोप उठते थे, तो यही कहती थीं कि कोई जादू की छड़ी नहीं है कि तुरंत हल निकल जाये. पर 64 वर्षो में कब-कब भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की गंभीर कोशिश हुई? यह तो कोई सरकार बताये? 1967 में लोकपाल विधेयक की चर्चा हुई. पर आज तक यह संसद से पास नहीं हुआ, तो गलती किसकी है? राजनीतिज्ञों और सरकारों की या अन्ना या रामदेव की? विदेशों में भारतीय धन रखा है, यह 1974 से चर्चा चल रही है, पर उसे लाने या नियंत्रित करने की चर्चा किसी सरकार ने नहीं की. यह दोष अन्ना का है या रामदेव का? भ्रष्टाचार सुरसा की तरह बढ़ता गया, पर उसे रोकने के लिए संसद ने या राजनीति ने 64 वर्षो में सख्त और कठोर कानून क्यों नहीं बनाये? क्या इसके लिए अन्ना या रामदेव दोषी हैं? भ्रष्टाचारियों को फ़ांसी चढ़ाने या सख्त सजा देने का कानूनी प्रावधान कौन कर सकता था, संसद और राजनीति ही न?

64 वर्षो में इन्होंने यह कदम क्यों नहीं उठाया? जबकि जवाहरलाल जी से लेकर मनमोहन सिंह तक हर प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार को देश का सबसे बड़ा दुश्मन कह चुका है. प्रगति में बाधक बता चुका है. क्या इस राजनीतिक विफ़लता के कारण ही अन्ना या बाबा रामदेव का उदय नहीं हुआ? अगर राजनीति, संसद ने अपना काम किया होता, तो अन्ना या रामदेव के उदय को जनसमर्थन कहां से मिलता? इस तरह संसद या राजनीति को अप्रासंगिक या महत्वहीन बनाने का काम तो राजनीति ने किया है. फ़िर अन्ना या रामदेव को दोष क्यों? अन्ना या रामदेव तो राजनीति की विफ़लता के मुद्दे पर उभर रहे हैं. अगर इन मुद्दों को राजनीति ने हल कर लिया होता, तो इन्हें खड़ा होने की जगह कहां मिलती? मेरे मित्र को इस पर भी आपत्ति है कि कांग्रेस कह रही है कि इसके पीछे कोई और हाथ है?

अन्ना पर तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं. यह भी कहा गया कि अन्ना ने प्रधानमंत्री को पत्र में जो कहा है, उससे लोकतंत्र की हत्या हुई है. पर अन्ना पर जो आरोप लगे, वैसे ही आरोप तो जेपी पर भी 1974-75 में लगे. देशद्रोही, सीआइए एजेंट, पूंजीपतियों के साथी वगैरह-वगैरह. 1977 में जनता ने इन आरोपों का करारा जवाब दिया, पर कांग्रेस ने सीखा ही नहीं है. वह फ़िर उसी भाषा-मुहावरे में बोल-बतिया रही है. क्या इसे ही कहते हैं, इतिहास दोहराना ! मेरे मित्र की एक और जिज्ञासा थी. कांग्रेस ने अन्ना पर 14 अगस्त को गंभीर आरोप लगाये. इसी तरह रामदेव व उनके साथियों पर रामदेव जी के आंदोलन के बाद गंभीर आरोप लगे हैं. अगर ये लोग आंदोलन नहीं करते, तो क्या इन्हें अपराध करते रहने की छूट कायम रहती? या ये व्यवस्था के खिलाफ़ सवाल उठा रहे हैं, तब इन्हें घेरा जा रहा है? इस अर्थ में ब्लैकमेलर की भूमिका में कौन है? व्यवस्था या अन्ना-रामदेव? मित्र की बात से समझ में आयी कि अण्णा की ताकत क्या है? असल ताकत तो अन्ना का चरित्र है. चरित्र, वसूल और साख खोती मौजूदा राजनीति को एक गांधीवादी चुनौती दे रहा है. वह बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं. न उनके पास धन-बल है. न संगठन. लोगों को लगता है कि यह आदमी सच्चा है. छल-कपट, षडयंत्र से दूर. सत्ता पाने के लिए नहीं लड़ रहा. देश बदलने की लड़ाई में कूदा है. इसलिए शायद यह आदमी सही हो. यही कारण है कि अन्ना को देशव्यापी समर्थन मिल रहा है.

अंत में मेरे मित्र ने एक और चुभती हुई बात कह दी. इस देश में दाउद इब्राहिम को नहीं पकड़ा जा सकता, हाल में मुंबई में हुए विस्फ़ोट के अपराधियों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, बोफ़ोर्स के दोषी क्वात्रोची को देश से भगा कर बचा दिया जाता है. उनके ऊपर से प्रामाणित मुकदमा उठा लिया जाता है, विदेशी बैंकों में देश का धन लूटने वाले शान व चैन से रहते हैं, स्वतंत्र हैं, बड़े-बड़े अपराधी व तस्कर मजे में हैं, उनका रुतबा है. राजनीति, संसद व विधायिका में अपराधी भरे हैं, पर ये सब कानून की पकड़ से बाहर हैं. पर एक गांधीवादी, धोती-कुरता व गांधीवादी टोपी पहना इनसान जब बदलाव की बात उठाता है, तो उसे गिरफ्तार करने में देश की पूरी ताकत लग जाती है. उस इनसान का अपराध क्या है? अपने मित्र के बहुत-सारे सवालों का जवाब नहीं दे पाया. क्योंकि ऐसे सवालों के जवाब आसान नहीं हैं?

हरिवंश

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आओ ना, 'गुलज़ार' कभी मेरी बालकनी में


जन्मदिन मुबारक...
चाँद को ऐसी-वैसी
जाने कैसी-कैसी
शक्लें देता रहता है..
आप लगा लो बाज़ी
उसके भीतर कोई
नटखट बच्चा रहता है...

७५ की उम्र में वर्ना,
कौन इश्क की बातें करता..
इतनी मीठी बोली में,
गप्पें, हंसी-ठिठोली में...
ऐसी इक आवाज़ की बस,
आवाज़ से झट याराने हों...
ऐसी खामोशी की जिनमे,
दुनिया भर के अफ़साने हों...

जाने कितने मौसम उसने..
किसी फकीरे की मानिंद,
अपने चश्मे से तोले हैं..
सब जादूगर, सारे मंतर...
उसकी फूंक के आगे...
बेबस हैं, भोले हैं....

आओ ना, 'गुलज़ार' कभी मेरी बालकनी में
यही बता दो चाँद तुम्हारा क्या लगता है...
चुपके चुपके थोड़ी विरासत ही दे जाओ...
दर्द का सारा बोझ, कहो अच्छा लगता है..
(गुलज़ार के लिए..)
निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 15 अगस्त 2011

प्रकाश झा का 'यूफोरिया' उर्फ आरक्षण...

अंग्रेज़ी में ‘यूफोरिया’ शब्द की तस्वीर में एक तरह के मानसिक उन्माद की स्थिति उभरती है जहां सावन के अंधे को सब हरा ही हरा लगता है...साइंसदानों की भाषा में इस परिस्थिति को Ideal state या आदर्श स्थिति भी कह सकते हैं जो असल में मुमकिन नहीं होती...आरक्षण के निर्देशन में प्रकाश झा फिलहाल उसी स्थिति के मारे दिखते हैं...ऐसी स्थिति तब आती है, जब आप ओशो या किसी और आध्यात्मिक गुरु की शरण में हों । प्रकाश झा शायद किसी ऐसे ही बॉलीवुडिया कहानी क्लब के मेंबर लगते हैं जहां होम्योपैथी की मीठी गोलियों की तरह मीठी-मीठी कहानियां बुनी जाती हैं। ‘राजनीति’ में इस मीठी गोली का असर कम था और ‘आरक्षण’ तक आते-आते साइड इफेक्ट भी ज़ाहिर होने लगे हैं। हालांकि, फिल्म का नाम बदल दिया जाए तो एक बार देखने में बुराई भी नहीं है।

आरक्षण जैसे विकराल, संवेदनशील और जटिलतम मुद्दे का इतना आसान समाधान निकालना प्रकाश झा की फिल्मी मजबूरी भी है और एक हद तक सफलता भी। सफलता इस मायने में कि वो बिना किसी पार्टी या विचारधारा पर चोट किए हुए अपनी कहानी का नाम भर ‘आरक्षण’ रख लेते हैं और इतने भर से उन्हें इतनी बदनामी मिलती है कि फिल्म आपकी-हमारी ज़ुबां पर चढ़ चुकी है। हालांकि, फिल्म रिलीज़ के तीसरे दिन ही हॉल इस क़दर ख़ाली था जैसे दिल्ली में कोई साउथ इंडियन मूवी लगी हो।

फिल्म की कहानी में आरक्षण का मुद्दा नमक जितना ही मौजूद है। बाक़ी तो अमिताभ ही अमिताभ हैं। वो अपने भारी-भरकम आवाज़ में जो भी कहते हैं, सच जैसा लगता है। हालांकि, उन्हें अब किसी सलीम-जावेद की ज़रूरत नहीं, मगर फिल्म में वो ‘एंग्री ओल्ड मैन’ बनकर उभरे हैं और केयरिंग ओल्ड मैन’ भी । उनके पास अब उम्र कम बची है वरना इस रोल की ताज़गी मुझे कई दिनों बाद अच्छी लगी। वैसे फिल्म के पहले हाफ में वो धृतराष्ट्र की तरह दिखते हैं, जहां सब कुछ होता जाता है और वो उसूलों का खूंटा गाड़े रहते हैं।

ख़ैर, प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ में कुछ वैसी ही बुनियादी ख़ामिया हैं जैसी मजहर कामरान ‘मोहनदास’ बनाने में कर गए थे। विषय के मर्म से लगाव मेरी तरह का पाठक या छिटपुट कवि बना सकता है, बड़ा फिल्मकार नहीं। उसके लिए लंबा होमवर्क और फिर सही किरदार चाहिए जो मुझे नहीं दिखे। सैफ और दीपिका कहीं से भी इस फिल्म में नहीं लिए जाने चाहिए थे। अजय देवगन तो प्रकाश झा के फेवरेट थे, पर पता नहीं इस बार क्यों नहीं राज़ी हुए। और विद्या बालन की क़ीमत दीपिका से ज़्यादा तो नहीं। ऊपर से प्रतीक की एक्टिंग और उनके हिंदी में बोले डॉयलॉग्स ठीक वैसे ही नकली लगते हैं जैसे आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में ख़ेमों की राजनीति करते नेता। गाने प्रकाश झा की मजबूरी से बन गए हैं। फिल्म की शुरुआत में ज़बरदस्ती दो गाने टपक पड़ते हैं जब आप इसके लिए तैयार नहीं होते। ‘’एक चानस तो दे दे…’’ गाने के भाव गहरे हैं मगर प्रसून जोशी ने इसलिए तो नहीं ही लिखे होंगे कि प्रतीक छिछोरे अंदाज़ में इस जुमले का प्रयोग दीपिका पर लाइन मारने के लिए लुटा दें। हालांकि, छन्नूलाल जी की आवाज़ में ‘’सांस अलबेली..’’ लाजवाब गीत है।

अब कहानी पर आते हैं। ठीक वैसे ही भटकी हुई है, जैसे देश में आरक्षण का मुद्दा भटका हुआ है। फिल्म में बस शिक्षा के बाज़ार बनते जाने के बीच में आरक्षण को लेकर कुछ नाटकीय डायलॉग्स हैं जिन्हें हम बार—बार थियेटर में सुन चुके हैं। दलितों-वंचितों के दुख से अनजाने में आहत और ब्राह्मणवाद से त्रस्त इस पीढ़ी को ही हर क़ीमत चुकानी है और ये हर जाति-वर्ग की त्रासदी है। पटना के सुपर-30 से लेकर रांची, दिल्ली कोटा तक पसरे प्राइवेट कोचिंग संस्थानों के पीछे की दुकानदारी के बीच प्रकाश झा वैसी ही उम्मीद लेकर आए हैं, जैसे मजबूर मनमोहन के अंगूठे की छाप पर यूपीए ‘राइट टू एजुकेशन’ लेकर आई थी। इस बात के लिए प्रकाश झा को दाद मिलनी चाहिए कि उन्होंने अपनी तमाम क्षमताओं के साथ नई पीढ़ी को हर तरह से बराबर एक समाज का सपना दिखाया है। हालांकि, ऐसा उत्थान तो लालू यादव भी चरवाहा विद्यालय खोलकर चाहते थे मगर मंशा ठीक न हो तो फिल्म और हकीकत दोनों ही फालतू लगते हैं। प्रकाश झा को ऐसे मुद्दों पर किसी फिल्मी राइटर से अच्छा किसी पॉलिटिकल या कम से कम साहित्यिक राइटर से कहानी में मदद लेनी चाहिए थी ताकि फिल्म में मसाले के अलावा भी कुछ स्वाद आता।

अब एक सीन देखिए। आरक्षण के नाम पर अचानक बवाल कटा है और माहौल एकदम सीरियस है। इन सबके बीच दीपिका अपने दीपक के साथ मूवी देखने को बेकरार है। ये उतना ही गैर-ज़िम्मेदाराना था जितना उस मीडियाकर्मी का अमिताभ से सवाल कि आप प्रिंसिपल से अपराधी बन गए, क्या कहना चाहेंगे। या फिर उस पंडित छात्र का विशुद्ध हिंदी बोलना और बात-बेबात अमिताभ का फिलॉसॉफी झाड़ना। (दीपिका यूं ही नहीं ऊबकर कह देती है कि डैडी, आई हेट माई लाइफ)। मनोज वाजपेयी फिल्म-दर-फिल्म उम्दा होते जा रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं। ठीक उसी स्पीड से जैसे प्रकाश झा स्तर खोते जा रहे हैं।

कुल मिलाकर आरक्षण की मूल व्यवस्था के खिलाफ लगती है प्रकाश झा की ‘आरक्षण’। पूरी तरह से नहीं, मगर इस मायने में कि मुद्दे की नस को समझ ही नहीं पाए प्रकाश झा। कोचिंग संस्थानों के बीच से गुदड़ी के लाल निकालने के लिए ही लड़ते रह गए पूरी फिल्म में। तभी तो हमारी जाननेवाली आंटी से मैंने जब पूछा कि फिल्म देखने क्यों नहीं गईं तो उन्होंने कहा कि मैंने वाशिंग मशीन में कपड़े डाले हुए थे और अगर मैं फिल्म में टाइम ख़राब करती तो कपड़े ख़राब हो जाते !!

निखिल आनंद गिरि

सोमवार, 8 अगस्त 2011

ज़िंदगी क्या है इक अमावस है...

9 अगस्त की ही एक अमावस भरी रात थी जब इस ब्लॉग के सर्वेसर्वा यानी हम धरती पर आए थे.....हर साल इस रोज़ कविता बन ही आती है..इस बार पुरानी कविताओं को फिर से शेयर करने का जी चाहता है...आपका जी चाहे तो दाद और जन्मदिन की मुबारकबाद देते जाएं...

चांद छुट्टी पर रहा होगा उस रात...


तितर-बितर तारों के दम पर,


चमचम करता होगा रात का लश्कर,

चांद छुट्टी पर रहा होगा उस रात...


एक दो कमरों का घर रहा होगा,

एक दरवाज़ा जिसकी सांकल अटकती होगी,

अधखुले दरवाज़े के बाहर घूमते होंगे पिता

लंबे-लंबे क़दमों से....


हो सकता है पिता न भी हों,

गए हों किसी रोज़मर्रा के काम से

नौकरी करने....

छोड़ गए हों मां को किसी की देखरेख में...

दरवाज़ा फिर भी अधखुला ही होगा...


मां तड़पती होगी बिस्तर पर,

एक बुढ़िया बैठी होगी कलाइयां भींचे....

बाहर खड़ा आदमी चौंकता होगा,

मां की हर चीख पर...


यूं पैदा हुए हम,

जलते गोएठे की गंध में...

यूं खोली आंखे हमने

अमावस की गोद में...


नींद में होगी दीदी,

नींद में होगा भईया..

रतजगा कर रही होगी मां,

मेरे साथ.....चुपचाप।।

चमचम करती होगी रात।।।


नहीं छपा होगा,

मेरे जन्म का प्रमाण पत्र...

नहीं लिए होंगे नर्स ने सौ-दो सौ,

पिता जब अगली सुबह लौटे होंगे घर,

पसीने से तर-बतर,

मुस्कुराएं होंगे मां को देखकर,

मुझे देखा भी होगा कि नहीं,

पंडित के फेर में,

सतइसे के फेर में....


हमारे घर में नहीं है अलबम,

मेरे सतइसे का,

मुंहजुठी का,

या फिर दीदी के साथ पहले रक्षाबंधन का....

फोटो खिंचाने का सुख पता नहीं था मां-बाप को,

मां को जन्मतिथि भी नहीं मालूम अपनी,

मां को नहीं मालूम,

कि अमावस की इस रात में,

मैं चूम रहा हूं एक मां-जैसी लड़की को...

उसकी हथेली मेरे कंधे पर है,

उसने पहन रखे है,

अधखुली बांह वाले कपड़े...

दिखती है उसकी बांह,

केहुनी से कांख तक,


एक टैटू भी है,

जो गुदवाया था उसने दिल्ली हाट में,

एक सौ पचास रुपए में,

ठीक उसी जगह,

मेरी बांह पर भी,

बड़े हो गए हैं जन्म वाले टीके के निशान,

मुझे या मां को नहीं मालूम,

टीके के दाम..



छत पर मैं हूँ और चाँद है...

आज न जाने जब से मेरी आँख खुली है,

दिन का ताना-बाना थोड़ा-सा बेढब है...

सूरज रूठे बच्चे जैसी शक्ल बनाकर,

आसमान के इक कोने में दुबक गया है...

कमरे के भीतर सन्नाटा-सा पसरा है...

कैलेंडर पर जानी-पहचानी सी तारीख दिखी है...

(जाना-पहचाना सा कुछ तो है कमरे में....)

नौ अगस्त....


नौ अगस्त...

बचपन में माँ ठुड्डी थामे कंघी करती थी बालों पर,

पापा हरदम गीला-सा आशीष पिन्हाते थे गालों पर,

बड़े हुए तो दूर अकेले-से कमरे में,

गीली-सी तारीख है,मैं हूँ,कोई नहीं है....


रिश्तों की कुछ मीठी फसलें,

बीच के बरसों में बोईं थीं,

वक्त के घुन ने जैसे सब कुछ निगल लिया है....


बढ़ते लैंप-पोस्ट और रौशनी की हिस्सेदारी के बीच,

लम्बी सड़कों पर सरपट दौड़ती साँसे,

जिंदगी को कितना पीछे छोड़ आई हैं,

अब ये भरम भी नहीं कि,

पीछे मुड़कर हाथ बढाओ तो

जिंदगी मेरी अंगुली थामकर चलने लगे....


एक शहर था,

जहाँ मेरी एक सिहरन,

तुम्हारे घर का पता ढूंढ लेती थी,

और फ़िर,

शोरगुल भरे शहर में,

तुम्हारे अहसास मैं आसानी से सुन पाता था...

एक शहर जहाँ जिस्म की दूरियां,

एहसास के रास्ते में कभी नहीं आयीं,

कभी नहीं.....


आज मुझे अहसास हुआ है,

उम्र का रस्ता तय करने में,

कुछ न कुछ तो छूट गया है...

कच्चे ख्वाब पाँव के नीचे,

नए ख्वाबो को लपक रहा हूँ....

हांफ रहा हूँ,


हाँफते-हाँफते अब अचानक मुझे,

याद आया है कि,पिछले मोड़ पर

नींद फिसल गई है "वॉलेट" से,

दिल धक् से बेचैन हुआ है....

इतनी लम्बी सड़क पे जाने किस कोने में,

बित्ते-भर की नींद किसी चक्के के नीचे,

अन्तिम साँसे गिनती होगी....

ख्वाब न जाने कहाँ मिलेंगे..


नौ अगस्त पूरे होने में

बीस मिनट अब भी बाकी हैं,

छत पर मैं हूँ और चाँद है...

(वो भी आधा, मैं भी आधा)


चाँद मेरे अहसास के चाकू से आधा है,

केक समझकर मैंने आज इसे काटा है,

आधा चाँद उसी शहर में पहुँचा होगा,

जहाँ कभी एहसास कि फसलें उग आई थीं,

जहाँ कभी मेरे गालों पर,

गीले-से रिश्ते उभरे थे....

..............................


ख़ास वक्त है, रोना मना है...


आओ इक तारीख सहेजें,

आओ रख दें धो-पोंछ कर,

ख़ास वक्त है....

कलफ़ लगाकर, कंघी कर दें...

आओ मीठी खीर खिलाएं,

झूमे-गाएं..

लोग बधाई बांट रहे हैं,

चूम रहे हैं,चाट रहे हैं...

किसी बात की खुशी है शायद,

खुश रहने की वजह भी तय है,

वक्त मुकर्रर

9 अगस्त,

घड़ियां तय हैं

24 घंटे...


हा हा ही ही

हो हो हो हो

हंसते रहिए,

ख़ास वक्त है,

रोना मना है...

खुसुर-फुसुर लम्हे करते हैं,

बीते कल की बातें,

पुर्ज़ा-पुर्ज़ा दिन बिखरे हैं,

रेशा-रेशा रातें....


उम्र की आड़ी-तिरछी गलियों का सूनापन,

बढ़ता है, बढ़ता जाता है...

एक गली की दीवारों पर नज़र रुकी है...

दीवारों पर चिपकी इक तारीख़ है ख़ास,

एक ख़ास तारीख पे कई पैबंद लगे हैं...

हूक उठ रही दीवारों से,

उम्र की लंबी सड़क चीख से गूंज रही है...


जश्न में झूम रहे लोगों की की चीख है शायद,

जबरन हंसते होठों की मजबूरी भी है,

उघड़े रिश्ते,भोले चेहरों का आईना,

कभी सिमट ना पाई जो, इक दूरी भी है...



वक्त खास है,

आओ चीखें-चिल्लाएं हम...

जश्न का मातम गहरा कर दें...

इसको-उसको बहरा कर दें...

आओ ग़म की पिचकारी से होली खेलें,

फुलझड़ियां छोड़ें...

आओ ना, क्यों इतनी दूर खड़े हो साथी,

सब खुशियों में लगा पलीता,

हम-तुम वक्त की मटकी फोड़ें...


ख़ास वक्त है,

इसे हाथ से जाने न देंगे,

जिन घड़ियों ने जान-बूझकर

कर ली हैं आंखें बंद,

उनकी यादें भी भूले से

आने न देंगे...


सांझ ढले तो याद दिलाना

आधा चम्मच काला चांद,

वक्त की ठुड्डी पर हल्का-सा,

टीका करेंगे...

तन्हा चीखों का तीखापन,

फीका करेंगे....



हा हा ही ही

हो हो हो हो

हंसते रहिए,

ख़ास वक्त है,

रोना मना है...
 
 
निखिल आनंद गिरि

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

कहीं बीच में जो रुकी है कहानी...

राशि मेरी ज़िंदगी में थोड़े वक्त के लिए ही आई....आप हमारे छोटे-से रिश्ते को दोस्ती कह सकते हैं या ज़्यादा समझ रखने वाले प्यार भी समझ सकते हैं...अगर ये प्यार है, तो मुझे प्यार कई बार हो चुका है...(प्रेमिकाएं मुझे गालियां दे सकती हैं...)..जिस तरह अचानक ज़िंदगी में आई, चली भी गई...हमारी मुलाकात न तो दोबारा हुई और न ही ऐसी कोई संभावना है...फ्रेंडशिप डे के ठीक पहले अचानक एक चिट्ठी आई तो सोचा यहीं शेयर कर लूं...बहुत दिन हुए, दिल्ली में किसी से इतना प्यार पाए...अगर आप भी किसी अच्छे दोस्त को याद करना चाहते हैं तो टूटी-फूटी नज़्म ही लिख कर भेज दें....प्यार में डूबे हर कच्चे-पक्के शब्द को नोबेल दिया जाना चाहिए..दिल से ही सही..

प्रिय निखिल,

आपसे वादा किया था कि आपके लिए कुछ लिखेंगे, तो बस आँखें बंद करके कुछ यादें इकठ्ठा करके, उनको तोड़ मरोड़ के, एक कविता लिखने का प्रयास किया मैंने... लिखते चले गए, ख्याल आया काफी लम्बी हो गयी है कविता पर कहने को अभी भी काफी कुछ बाकी है...जो कहना बाकी है वो आपको पता है और हमको भी तो फिर कहने की क्या ज़रुरत और फिर कुछ बातों सिर्फ हम दोनों के बीच राज़ है, वह मैं औरों से बांटना नहीं चाहती...आशा है आपको पसंद आएगा ये प्रयास...

ऐसे तो और भी बहुत कुछ है लिखने को,
लेकिन जिस पर लिखने जा रही हूं, वो भी कुछ कम नहीं है...
आज ही सवेरे फिर मिल गया...
जब भी मिलता है मुझको,
अपने आप से मिलवा देता है....
ऐसे बड़ा ज़िंदादिल है मगर,
कहीं कुछ छिपा है...

कॉलेज के एकमात्र खंडहर-से पुस्तकालय में.
चुड़ैल-सी शक्ल बनाए बैठा था वो..
जैसे निखिल आनंद गिरि नहीं हिंदी का रचयिता हो...
ऐसे हर वक्त ऐँठता है वो...
मौका मिलते ही शेखी बघारने से बाज़ नहीं आते जनाब,
उनके हिसाब से दुनिया में उनको छोड़कर बाक़ी सब हैं ख़राब
इन सब के पीछे मगर एक शांत, थोड़ा शैतान-सा बच्चा है...
उस काली कलूटी शक्ल के पीछे मगर जो दिल है, वो अच्छा है....

दोस्ती करमे में तो माहिर हैं हुजूर,
दिल तोड़ने का फन भी जानते हैं ज़रूर
इतना सोचते हैं कि ख़ुद को खो दिया है...
कोई पूछ ले कान ऐंठ के..
मुंह फुला के कहता है 'मैंने क्या किया है...'

अंग्रेज़ी अच्छी है लेकिन अंग्रेज़ी से ख़ास लगाव नहीं है...
उनके हिसाब से नदी का आजकल सीधा बहाव नहीं है...
एक वो है बाहर से तो दुनिया से रुठे हुए-से हैं...
पर लगता है जनाब अंदर से ख़ुद टूटे हुए-से हैं...

पीछे पड़ जाना इनकी आदत में शामिल है,
और बात का बतंगड़ बनाने में इन्हें महारत हासिल है...
मिट्टी की खुशबू आती है जब भी ये बोलते हैं,
न जाने अनजाने में ये ऐसे कितनों के पोल खोलते हैं...

एक रास्ता मुझे भी दिखाया था कभी,
वहीं भूल आयी थी अपना एक हिस्सा
याद आया अभी...

एक दुनिया दिखाई थी उम्मीद की,
सपनों की और  विश्वास की...
आज वही उम्मीद, सपने और विश्वास...
वजह हैं हमारी सांस की....

सिखाया था मुझे विश्वास करना अपने ख़्वाबों पर,
सिखाया था मुझे दिल जीतना किसी का सिर्फ बातों पर....

आज देखती हूं तो लगता है,
अपनी ज़िंदगी की ही एक ख़ूबसूरत झांकी है..
हां, तुम ठीक कहते थे निखिल आनंद गिरि
सिर्फ नाम ही काफी है...

राशि

बुधवार, 20 जुलाई 2011

कौन कब मरता है, बस ये देखना है...

ज़र्रा-ज़र्रा इक शहर छलनी हुआ है,

आप कहते हैं महज़ इक हादसा है...

रात के खाने का सब सामान था,

दाहिना वो हाथ अब तक लापता है

आपके आने से ही क्या हो जाएगा

छोड़िए भी आपसे कब क्या हुआ है...

एक मेहनतकश शहर के चीथड़े में

ढूंढिए तो कौन है जो खुश हुआ है....

कौन कब मरता है, बस ये देखना है

मुल्क ही बारुद में लिपटा हुआ है

ठीक है मुंबई कभी रुकती नहीं है....

इक समंदर आँख में ठहरा हुआ है...


निखिल आनंद गिरि
(13 जुलाई को मुंबई में हुए बम धमाके के तुरंत बाद... )

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

हम भी कई रोज़ से जिए ही नहीं...

तमाम राहें जो हमारी न हुईं...

तमाम किस्से जो हमारे न हुए...

और वो चेहरे जो अजनबी ही रहे...

छोड़ आएंगे कहीं धोखे से....


अपनी ही छत पे सभी चांद उगें,

अपने उजालें हों, सूरज भी सभी...

आसमां पर हो सिर्फ अपना हक़...

ज़िंदगी नज़्म से भी हो सुरमई...


एक कप चाय जो कभी पी नहीं

और वो गीत जिनकी धुन भूले

एक वो ख़त जिसमें अधूरा-सा कुछ

उस एक शाम....सब बांटेगे हम...


एक तारीख में लिपटी हुई यादें सारी

एक मुस्कान में लिपटे हुए सब मौज़ूं...

तेरी नाराज़ नज़र, मेरी गुस्ताख ज़बां...

सब अदालत तेरी, गुनाह सब मेरे..


जैसे जन्नत मिले है मौत के बाद..

तुझसे मिलना है कई साल के बाद

तुझसे मिलकर ही मेरे सरमाया

तय करेंगे इस रिश्ते की मियाद...


आओ कि इस शहर में जान आए

हम भी कई रोज़ से जिए ही नहीं....

निखिल आनंद गिरि

शनिवार, 9 जुलाई 2011

मेट्रो में पिता

मेरे पिता जब मेट्रो में होते हैं...


तो उनकी नज़रें नीची होती हैं..


एक दुनिया जो छूटती जाती है मेट्रो से..

एक मीठी आवाज़, एक गंभीर आवाज़...

बताती है उन स्टेशनों के नाम....

‘अगला स्टेशन प्रगति मैदान’


पिता उन आवाज़ों से अनछुए..

निहारते हैं प्रगति मैदान के नीचे

एक गंदी बस्ती है शायद..

मुस्कुराते हैं पिता....

शायद याद आया हो गांव..

और बर्तन मांजती एक औरत...

शायद याद आए हों गांव के लोग....

जो नहीं दिखते कहीं मेट्रो में....


सब उदास लोग, सब अकेले...

और सबसे अकेले पिता..

जिनके मेट्रो में भी गांव है...

और शायद संतोष भी..

कि मेट्रो दिल्ली में ही है....

वरना गांव भी उदास हुआ करते...


निखिल आनंद गिरि