बुधवार, 11 जुलाई 2007

मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे .............

ताजमहल को नये सात आश्चर्यों में शामिल कर लिया गया, बड़ा हो- हल्ला हुआ, वोट दीजिये, एस.एम.एस कीजिये वग़ैरह । और तिजारत यानी व्‍यापार के इस दौर में ताजमहल को चंद एस.एम.एस. की बिना पर सर्टिफिकेट दे दिया गया । इस सबसे अलग ताजमहल कभी उर्दू शायरी में भी चर्चा और बहस का मुद्दा था । शकील बदायूंनी ने लिखा था- इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है । और तरक्का पसंद साहिर से रहा नहीं गया । ये उनका जवाब था । इस नज़्म का शीर्षक है—ताजमहल........चूंकि इसमें बहुत बुलंद उर्दू के अलफ़ाज़ हैं इसलिये कुछ कठिन शब्दों के मायने दिये जा रहे हैं ।



ताज तेरे लिए इक मज़हरे-उल्‍फ़त ही सही
तुझको इस वादिये रंगीं से अकीदत ही सही
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझसे

बज़्मे-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्‍या मानी
सब्‍त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्‍या मानी
मेरे मेहबूब पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा तूने
सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है
कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं
क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं
दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं
मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी
जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील
उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील
ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल
ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे ।।

कुछ कठिन शब्‍दों के मायने
मज़हर-ऐ-उल्‍फत—प्रेम का प्रतिरूप
वादिए-रंगीं—रंगीन घाटी
बज्मे शाही—शाही महफिल
सब्‍त—अंकित,
सतवते-शाही— शाहाना शानो शौक़त
पसे-पर्दा-ए-तशहीरे-वफ़ा—प्रेम के प्रदर्शन/विज्ञापन के पीछे
मक़ाबिर—मकबरे तारीक—अंधेरे सादिक़—सच्‍चे
तशहीर का सामान—विज्ञापन की सामग्री
हिसार—किले
मुतलक-उल-हुक्‍म—पूर्ण सत्‍ताधारी
अज़्मत—महानता
सुतूं—सुतून
दामने-देहर—संसार के दामन पर
अज़दाद—पुरखे
ख़ूं—खून
सन्‍नाई—कारीगरी
शक्‍ले-जमील—सुंदर रूप
बेनामो-नुमूद—गुमनाम
चमनज़ार—बाग़
मुनक़्क़श—नक्‍काशी

साभार : radiovani.blogspot.com

गुरुवार, 5 जुलाई 2007

तुम सिखा दो ........

दुःख हो या कि सुख सदा उत्सव मनाना, तुम सिखा दो॥
दूसरों के मर्म पर सब कुछ लुटाना, तुम सिखा दो॥
मुस्कुराना तुम सिखा दो॥

जानता हूँ, सैकड़ों बादल रखे हैं, हँसती आँखों में छिपाकर,
तृप्त हो लेती हो अपना मन, अकेले में भिगाकर
और कह देती हो मुझसे- 'सुख इसी अवसाद में है'!!
आह!! कैसा सुख कि अपना घर जलाकर,
नीड़ औरों का बसा खुद को मिटाना, तुम सिखा दो॥
मुस्कुराना तुम सिखा दो॥

मैं कहाँ रोया कि जब कोई बात गड़ती है हृदय में
कब बता पाया कि तुम ही मार्गदर्शक हर विजय में
और तुम... आकाश के निर्लिप्त पंछी की तरह ही
मौन के विस्तार को भी, बाँधती हो एक लय में
आँसुओं की लय पिरोकर, गुनगुनाना, तुम सिखा दो॥
मुस्कुराना तुम सिखा दो॥

रात का अंतिम प्रहर है, तुम निरंतर दिख रही हो
मैं तो केवल शब्द गढ़ता, तुम ही मुझको लिख रही हो
चाहता हूँ, प्रेम-रूपी इस शिला के मिटा डालूँ लेख सारे,
मिलन कैसा?? हम किसी सूखी नदी के दो किनारे!!
तुम न इस सूखी नदी पर रेत का सेतु बनाना
सब भुला दो, है उचित सब कुछ भुलाना
मुस्कुराना तुम सिखा दो...

निखिल आनंद गिरी
हिंद-युग्म पर पुरस्कृत कविता (देखें www.merekavimitra.blogspot.com)

एक अधूरा सच

जब कभी लिखी जायेगी शून्य की कथा,

सभ्यताएं मुँह बाए हमें निहारेंगीं......

क्या उत्पत्ति का सच दोगला भी हो सकता है???



निरुत्तर होगा समय,

देखकर एक समानांतर दुनिया,

एक विभाजन रेखा,

पौरुष और नारीत्व के बीच!!!



हम!!

जो खेंचते हैं लकीर,

होने और ना होने के बीच....


हम!!

जो हैं साधना, प्रीति या राधा...


हम!!

जिनका अस्तित्त्व सिर्फ आधा......



तुम!!


जो पूरा होने का गुमान भरते हो,

कभी ना सुन पाए टीस की,

तुम्हारी सारी पूर्णता समझ ना सकी,

व्यथा एक सवाली की...



हम!!

जो बन ना सके कभी;
भाई, बहन, दूल्हा या दुल्हन....

रिश्तों की देहरी लांघकर,

हमने गढी है एक नयी परिभाषा,

नए अर्थ..धर्म के जात-पात .......


मस्ती भरी बोली,
मन यायावर...

हाँ!! हम वही हैं...

जिन्हे तुम कहते हो,

छक्के, हिजडे या किन्नर!!!



तुम!! जो पौरुष का दंभ भरते हो,

झूठ की नींव पर सच कि जुगाली करते हो...


याद रखना........

एक अधूरा सच हैं हम....

पौरुष का कवच हैं हम.......



निखिल आनंद गिरि
9868062333
मैं नहीं हूँ.....

दीखता है जो तुम्हे ऊंचे शिखर पर, मैं नहीं हूँ...
अहम का पुतला है, वो मेरे बराबर, मैं नहीं हूँ...

तिमिर मुझको प्रिय, कि अब तक इसी ने है संभाला,
छीनकर सर्वस्व मेरा, चांदनी क्यों सौंपती मुझको उजाला??
भूल जाये जो निशा को सूर्य पाकर मैं नहीं हूँ....
अहम का पुतला है, वो मेरे बराबर, मैं नहीं हूँ...

मैं अगर होता बड़ा तो वश में कर लेता समय को,
छवि मेरी जो तुम्हारे मन बसी है, तोड़ता उस मिथक भय को,
जो तुम्हारे प्रेम को दे सके आदर, मैं नहीं हूँ,
अहम का पुतला है, वो मेरे बराबर, मैं नहीं हूँ...

मैं किसी का दर्द सुनकर क्षणिक सुख भी दे ना पाऊं,
फिर तुम्हारे प्यार का पावन-कलश कैसे उठाऊं??
प्यार लौटा पाऊं, प्रिय का प्यार पाकर, मैं नहीं हूँ....
अहम का पुतला है, वो मेरे बराबर, मैं नहीं हूँ...
दीखता है जो तुम्हे ऊंचे शिखर पर, मैं नहीं हूँ......

हिंद युग्म पर प्रकाशित(देखें www.hindyugm.com)
आपके स्नेह का शुभाकांक्षी
निखिल आनंद गिरि
9868062333